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Saturday, January 12, 2019

यहां होता है मकर संक्रांति का बेसब्री से इंतजार

लगाया जा रहा झूला

मकर संक्राति नियमित अंतराल पर होने वाली एक खगोलीय घटना है। इस दौरान सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते ही उत्तरायण हो जाते हैं। झारखंड में इस दिन का बेसब्री से इंतजार होता है, कई जगह इस अवसर पर खिचडी मेला का आयोजन किया जाता है। आज मैं झारखंड के गिरिडीह में हो रहे खिचड़ी मेला की तैयारी का विवरण साझा कर रहा हूं वहीं 15 जनवरी को मेला को ले माहौल व अनुभव  भी पोस्ट करूंगा। 


झारखंड के सर्वोच्च पर्वत होने का गौरव प्राप्त पारसनाथ पर्वत की हसीन वादियों में बसा मधुबन खुद को मकर संक्रांति मेला की तैयारी में लगा दिया है। आसपास के क्षेत्रों में मेला की चर्चा तेज हो गयी है। कई ऐसे लोग हैं जो संक्राति के अवसर पर मधुबन, पारसनाथ जाने की योजना बना रहे हैं। कुछ 14 जनवरी को ही मधुबन पहुंच जाऐंगे तो कुछ 15 जनवरी को अहले सुबह पारसनाथ के लिए रवाना होंगे। योजानाएं भी दूरी के आधार पर बनरयी जा रही है। वहीं मधुबन में मेला को ले तरह तरह के झूले लगाये गये हैं। किसी भी सैलानी को किसी भी प्रकार की समस्या न हो इसके लिए समिति द्वारा जर्बदस्त तैयारी की गयी है। प्रतिवर्श मकर संक्राति के अवसर पर एक लाख सैलानी मेला का लुत्फ उठाने यहां पहुंचते है। लगभग दो सौ किलोमीटर के दायरे से लोग यहां मेला देखने पहुंचते हैं।

कब से हो रहा है मेला का आयोजन 

गिरिडीह जिला के पीरटांड प्रखंड स्थित मधुबन में कब से मेला लग रहा है इसका ठीक ठीक विवरण किसी के पास नहीं है। अधिकांश लोगों ने बताया कि जब से उन्होंने होश संभाला है मकर संक्राति के अवसर पर यहां मेला लगते हुए देखा है। आज से तीस वर्ष पहले मेला का दायरा काफी सिमटा हुआ था। पर बदलते समय का साथ मेला ने भी अपना रूप बदला है और इसी क्रम में इसका दायरा बढ़ता जा रहा है। यही वजह है कि अब मेला देखने आने वालों की संख्या का आंकड़ा एक लाख छूने लगा है। मेला के दिन न केवल मेला मैदान व मधुबन का मुख्य मार्ग बल्कि पारसनाथ पर्वत का नजारा भी पूरी तरह से बदल जाता है। कहीं पैर रखने की जगह नहीं मिलने लगती है।

पिछले 10 वर्षों से मेला का कमान संभाल रही है समिति

आज से 10 वर्ष पहले मेला का आयोजन आज की तरह व्यवस्थित और वृहत नहीं होता था। सैलानियों की परेशानी को देखते हुए आसपास के 20 गांवों के ग्रामीणों ने वर्ष 2010 के नवंबर माह में मकर संक्राति मेला समिति का गठन किया। समिति ने पूरी मुस्तैदी के साथ मेला का संचालन करना शुरू कर दिया। दर्जनाधिक सदस्यों की बेहतर रणनीति व कड़ी मेहनत ने मेला का रूप बदल दिया। यही वजह है कि मेला आनेवालों की संख्या सैकड़ों से हजारों में रूपांतरित हो गयी। मेला को ले बैठकों का दौर महीनों पहले शुरू हो जाता है। छोटी सी छोटी चीजों को भी ध्यान में रखकर तैयारी की जाती है। बात चाहे वाहन पार्किंग की हो, पूछताछ कार्यालय की हो या फिर सैलानियों की सहायता से संबंधित, हर तरह की सुविधा मुहैया कराने की कोशिश की जाती है।
    
                                     बिरनगड्डा के मैदान में मेला का आयोजन किया जाता है। इस मेला में तरह तरह के झूले लगाये जाते हैं। इस बार भी झूला आदि  लगाया जा रहा है। वहीं कई तरह की दुकानें भी सज जाती है। मेला के पहले ही पार्किंग की व्यवस्था की जाती है ताकि यहां आने वाले लोग अपने वाहन पार्क कर निंश्चिंत होकर मेला का आनंद उठा सके। कुछ लोग मेला का आंनद उठाते हैं, कुछ मधुबन स्थित जैन मंदिरों की भव्यता व सुंदरता को निहारते हैं तो कोई पर्वत यात्रा शुरू कर देते हैं। पर्वत की प्राकृतिक सुंदरता सहज ही लोगों को अपनी और आकर्षित कर लेती है। मुख्य रूप से 15 जनवरी को भारी भीड़ उमड़ती है, झारखंड में यह मेला ‘खिचड़ी मेला‘ के नाम से भी जाना जाता है।

झारखंडी संस्कृति की झलक है यह मेला: आचार्य
मधुबन में आयोजित होने वाले मकर संक्राति मेला में हमे झारखंडी संस्कृति की झलक मिल जाती है। अलग अलग समुदाय से लोग प्रकृति की सुंदरता को निहारने यहां पहुंचते है। यहां पहुंचते ही सभी एक रंग में रंग जाते हैं। संका्रति एक नियमित रूप से होने वाली खगोलीय घटना है। यू ंतो एक वर्श में 12 संका्रंति होती है यानि हर महीने संक्राति होती है पर मकर संका्रंति का अलग महत्व है। झारखंड का मुख्य फसल धान है और इस समय लोग अपनी फसलों को घर लाकर कृषि कार्यों से निवृत हो जाते हैं। उक्त बातें मधुबन में रह रहे आचार्य सुयश सूरी जी महाराज ने कही। मैनंे आचार्य श्री से इसलिए उनका विचार लिया क्योंकि इनका जन्म बोकारो जिला के पर्वतपुर में हुआ है। इन्होंने जैन दर्शन, संस्कृत व ज्योतिष का गहन अध्ययन करने के साथ -साथ झारखंड का भ्रमण करते हुए यहां होने वाले विभिन्न आयोजनों को काफी करीब से समझने की कोशिश की है। मधुबन मकर संका्रति मेला को ले कहते हैं कि बदलते समय के साथ काफी सकारात्मक परिर्वतन हुआ है।


साभार: दीपक मिश्रा, तीर्थयात्रा  

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