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Tuesday, August 27, 2019

2 सितंबर को किया जायेगा हरितालिका व्रत


 स्त्रियों के सौभाग्य का द्योतक हरितालिका व्रत (तीज) 2 सितंबर 2019 को किया जायेगा। यह व्रत काफी कठिन होता है क्योंकि व्रत के दौरान निर्जला उपवास करते हुए पूजोपासना करने का नियम है। यह व्रत प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्लपक्ष तृतीया को मनाया जाता है। सौभाग्यवती स्त्रियां चिरस्थायी सौभाग्य की कामना से इस व्रत को पूरी श्रद्वा व विश्वास से करती है। कुल मिलाकर यह व्रत वैधव्य दोषनाशक तथा पुत्र पौत्रादि को बढ़ाने वाला होता है। अलग अलग स्थानों पर व्रत विधि या नियम में अंतर हो सकता है।
    व्रत के एक दिन पूर्व व्रत करने को तैयार महिलाएं स्नान, पूजा आदि निवृत होकर सात्विक व शुद्ध आहार ग्रहण करती है। तथा दूसरे दिन निर्जला उपवास करती हैं। इस दौरान बालु से भगावन शिव व पार्वती आदि की प्रतिमा बनाकर पूजन करती है। वहीं रात में रात्रि जागरण करते हुए पूजा करने का विधान है। ठीक दूसरे दिन बालु से बनी प्रतिमा को किसी जलस्त्रोत में प्रवाहित कर व्रत का पारण करती हैं। बनारस से प्रकाशित पंचांगों के अनुसार इस वर्ष दो सितंबर को हरितालिका व्रत है।

कैसे करें यह व्रत

व्रत करने वालों के लिए यह आवश्यक है कि सूर्योदय से पहले उठकर भगवान का स्मरण करते हुए नित्य क्रिया से निवृत होकर पूजा करें।
          मन्दारमालाकुलितालकायै   कपालमालांकितशेखराय।
          दिव्याम्बरायै च दिगम्बराय नमः
शिवायै च नमः शिवाय।।
(मन्दार की माला से जिन का केषपाष अलंकृत है और मुण्डों की माला से जिन की जटा अलंकृत है, जो दिव्य वस्त्र धारण की है और जो दिगंबर हैं, ऐसे श्री पार्वतीजी तथा शिवजी को प्रणाम करता हूं) इस श्लोक से भगवान शिव व पार्वती का ध्यान करें तथा पूजन शुरू करें। चैबीस घंटे के दरम्यान कई चरणों में पूजा की जाती है। हरितालिका व्रत के बारे में बताते हुए भगवान शिव ने पार्वती को बताया था कि जो स्त्री अपने सौभाग्य की रक्षा करना चाहती हो वह यत्नपूर्वक इस व्रत को करें। पहले केले के खम्भे आदि से सुशोभित एक मंडप बनावें तथा उसमें पार्वती जी तथा शिवजी की प्रतिमा स्थापित करें। उस रोज दिन भर उपवास कर बहुत से सुगंधित फूल, गंध, मनोहर धूप, ऋतुफल, नैवेद्य आदि एकत्र कर पूजा करे। इस क्रम में मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करें। जो स्त्री इस प्रकार पूजन करती है वह सब पापों से छूट जाती है तथा सौभाग्य का उदय होता है।

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व्रत का नाम हरितालिका क्यों पड़ा

व्रत का नाम हरिततालिका रखने के पीछे का कारण प्रकट करते हुए भगवान शिव ने कहा था कि पार्वतीजी को उनकी सखियां हर ले गयी थी। इसलिए इस व्रत का नाम हरितालिका व्रत पड़ गया।


हरितालिका व्रत कथा

कैलाश पर्वत पर बैठी हुई पार्वती जी ने भगवान शिव से एक ऐसे व्रत के बारे में जानकारी चाहती हैं जो सबसे सरल व उत्तम फलदायी देने वाला हो। इसी सवाल का जवाब देते हुए भगवान शिव हरितालका व्रत के बारे में बताते हैं। भाद्रपद मास में हस्त नक्षत्र से युक्त शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरितालिका व्रत करने मात्र से सभी पापों से मुक्त हो जाती हैं तथा सौभाग्य का उदय हो जाता है। इसी व्रत का फल है कि पार्वती जी को भगवान शिव का आधा आसन प्राप्त हुआ। बीते समय की कहानी बताते हुए भगवान शिव ने कहा कि पर्वती ने बाल्यकाल में घोर तपस्या की। बारह वर्ष तक उलटी टंगकर केवल धुआं पीकर रही। चैंसठ वर्ष तक सूखे पत्ते खाकर रही। माघ मास में भी  जल में बैठी रहती व वैशाख की दुपहरिया में पंचाग्नी तापती थी। श्रावण के महीने में जल बरसता तो तुम भूखी प्यासी रहकर मैदान में बैठी रहती थी। यह सब देखकर पार्वती के पिता हिमवान को बहुत कष्ट हो रहा था। और वह यह  देख कर चिंतन करने लगे कि अपनी कन्या का विवाह किससे करायें। उन्होंने अपनी व्यथा महर्षि नारद को भी बतायी नारद ने भगवान विष्णु का नाम योग्य वर के रूप में सुझाया। इधर अपने यह सब सुनकर पार्वती विलाप करने लगी तथा उन्होंने अपने सखियों को बताया कि वह तो म नही मन भगवान शिव को पति मान चुकी है। और वह एकमात्र शिवजी को ही अपना पति बनाना चाहती है। वह इतना दुखित थी कि वह देहत्याग करने की बात करने लगी। इस बात पर उनकी सखियों ने उन्हें पिता को बिना कुछ बताये वन जाने की सलाह दी। जब हिमवान को पता चला कि उनकी पुत्री घर पर नहीं है तो वह तरह तरह की बातों का चिंतन कर घबराने लगे। उन्हें लगा किसी ने उनकी पुत्री को हर लिया है।
          वहीं दूसरी तरफ पार्वती चलते चलते एक भयानक वन में पहुंच गयी। वहीं शिवजी की एक बालुकामयी प्रतिमा बनाकर अपनी सखियों के साथ निराहार रहकर भगवान शिव की आराधना करने लगी। भाद्रपद शुक्लपक्ष की हस्तयुक्त तृतीया के दिन भगवान शिव की विधिवत पूजन किया तथा रात भर जागरण किया। इस व्रतराज के प्रभाव से शिव का आसन डोलने लगा और वे तत्काल उक्त स्थल पर पहुंच गये। वरदान के तौर पर पार्वती ने शिव को अपने पति के रूप में मांग लिया। शिव द्वारा वरदान के जवाब में ‘तथास्तु‘ कहने पर पार्वती ने बालुकामयी प्रतिमा को नदी में प्रवाहित कर दिया। इधर पार्वती को खोजते खोजते हिमवान भी पार्वती के पास पहुंच गये तथा पार्वती केे विरूद्ध कुछ भी करने का सांत्वना दिया। और इस तरह पार्वती को भगवान शिव पति के रूप में प्राप्त हो गये।।

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