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बुधवार, 30 अक्तूबर 2019

31 अक्टूबर से शुरू हो रहा है छठ का त्रिदिवसीय अनुष्ठान

सूर्यषष्ठी डाला छठ का त्रिदिवसीय अनुष्ठान अपनी परंपरा के साथ गुरूवार यानी 31 अक्टूबर से शुरू हो रहा है। एक नवंबर को खरना की विधि पूरी की जायेगी तो 2 नवंबर की शाम को अस्ताचलगामी सूर्य को अघ्र्य देकर विधिवत पूजा की जायेगी वहीं रात भर की प्रतीक्षा के बाद तीन नवंबर को उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर इस व्रत का पारण कर लिया जायेगा। और इस तरह तीन नवंबर को छठ व्रत का समापन हो जायेगा।
 

 

 छठ की विधि

   लोक आस्था का महापर्व बिहार - झारखंड के अलावा अब देश के विभिन्न जगहों में पूरी आस्था व श्रद्धा से मनाया जाता है। अगर यह कहें कि यह व्रत प्रवासी भारतीयों के साथ-साथ विश्वभर में प्रचलित हो गया है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह व्रत करना काफी कठिन होता है। इसमें जहां छठ व्रती को छत्तीस घंटे का निर्जला उपवास करना होता है वहीं इस पर्व में पवित्रता व शुचिता का काफी ख्याल रखा जाता है। यूं तो सालभर में छठ पर्व दो बार मनाया जाता है। एक तो चैत मास में और दूसरा कार्तिक मास में मनाया जाता है पर कार्तिक मास का छठ व्यापक तौर पर मनाते हुए देखा जाता है। कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि को इस व्रत की शुरूआत हो जाती है। व्रत में पवित्रता का विशेष ख्याल रखा जाता है। व्रत के प्रथम दिन यानी चतुर्थी को कदुआ भात कहते हैं। इस दिन व्रती द्वारा स्नान आदि कर के नये चूल्हे में कद्दू की सब्जी व अरवा चावल का भात बनाया जाता है। इसमें सेंधा नमक का ही प्रयोग किया जाता है। फिर इसे लोग प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। वहीं दूसरे दिन अर्थात कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रती पूरा दिन उपवास रखते हैं तथा शाम को पूजन कर प्रसाद के रूप में खीर ग्रहण करते हैं। इस क्रिया को खरना कहा जाता है। खरना में भी कई नियम हैं इस क्रम में किसी भी तरह का व्यवधान नहीं आना चाहिए नही ंतो व्रती बीच में ही प्रसाद लेना छोड़ देते हैं। और खरना के बाद फिर से शुरू हो जाता है 24 घंटे का निर्जला उपवास। षष्ठी को नदी, तालाब या किसी जलस्त्रोत में अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है तथा सप्तमी को उदीयमान सूर्य को। यह व्रत भगवान भास्कर व उनकी बहन छठी मईया को समर्पित है। इसमें न तो किसी तरह के मंत्रोच्चार की आवश्यकता है न तो किसी आचार्य व पंडित की और न ही मूर्तिपूजा की। बस जरूरत है भाव की इसमें प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य को अर्घ्य देकर पूजा की जाती है।

छठ से संबंधित पौराणिक कथायें

   इस व्रत को करने से पारिवारिक सुख- समृद्धि तथा मनोवांछित फल की प्राप्ती होती है। छठ पर्व को ले कई पौराणिक कथायें भी हैं। कहा जाता है कि लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम व माता सीता ने भगवान सूर्यदेव की विधिवत पूजा अर्चना की थी। सप्तमी को भी सूर्योदय के वक्त दोनों ने आराधना किया था। वहीं दूसरी कथा के अनुसार महाभारत काल में सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने भगवान सूर्य की पूजा की थी। वहीं एक ओर कथा के अनुसार एक समय पियवद नामक एक राजा थे जिन्हें कोई संतान नहीं थी। महर्षि कश्यप के परामर्शानुसार उन्होंने पुत्रेष्टी यज्ञ कराया और पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनायी गयी खीर दी। लेकिन मृत पुत्र का जन्म हुआ। राजा अपने मृत पुत्र को लेकर श्मशान गये और विलाप करते हुए खुद प्राण त्यागने का फैसला ले लिया। तभी ब्रहमाजी की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और राजा को कहा कि वे सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न षष्ठी की पूजा करें साथ ही साथ अन्य लोगों को भी पूजा करने के लिए प्रेरित करें। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ती हुई।

छठ से संबंधित तारीख

एक बार फिर से जान लेते हैं कि किस दिन क्या मनाया जाना है।
31 अक्टूबर . नहाय.खाय
1 नवंबर . खरना
2 नवंबर . शाम का अर्घ्य
3 नवंबर . सुबह का अर्घ्य

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