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गुरुवार, 31 अक्तूबर 2019

नहाय खाय के साथ शुरू हुआ छठ व्रत


झारखंड के एक घाट पर बना प्रवेश द्वार
मनोज और राजू छठ पर्व मनाने को ले क्रमशः दिल्ली और बैंगलुरू से वापस अपने घर आये हैं। रोजगार के लिए वर्षों पहले ही इन दोनों ने महानगरों की ओर रूख कर लिया था। घर से काफी दूर रहने के बावजूद ये पूरे साल में महज एक बार ही घर आ पाते हैं और यह समय है छठ पर्व का। यहां पहंचते ही चारो ओर हो रही छठ की तैयारी न केवल मन में पर्व के प्रति उत्साह भर देता है बल्कि ग्रामीण इलाकों में मिट्टी की सोंधी महक अपनत्व के भाव को दोगुना कर देती है। और ये सब कुछ ऐसी चीजें हैं जो अप्रत्यक्ष रूप से ही सही पर हर वर्ष गांव की ओर खींच लेती है। इनकी भूमिका का उल्लेख नहीं किया जा सकता, मात्र महसूस किया जा सकता है। मनोज और राजू की तरह हजारों लोग हैं जो प्रतिवर्ष छठ के अवसर पर अपने गांव पहुंचते हैं। इसी तरह बिहार के जमुई जिला का एक गांव है रामचंद्रडीह। यहां भी नहाय खाय के साथ सूर्यषष्ठी व्रत के त्रिदिवसीय अनुष्ठान का आगाज हो चुका है। जिन घरों में छठ व्रत होना है वह घर पूरी तरह से तैयार हो गया है। यानी घर की रंगाई- पुताई हो चुकी है यहां तक की आंगन को भी गोबर से लिप कर पूरी तरह पवित्र कर लिया गया है। घर के सभी सदस्य आ चुके हैं।
      दिन गुरूवार और तिथि कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तथा आमजन में नहाय खाय के नाम से प्रसिद्ध। सुबह की शुरूआत अन्य दिनों से काफी अलग, न केवल छठ व्रती बल्कि परिवार का हरेक सदस्य अनुशासित तथा पवित्रता को ले सतर्क। नहाय खाय के दिन व्रती स्नान कर कद्दू की सब्जी और अरवा चावल पकाती है और इसे ही भोजन के रूप में ग्रहण किया जाता है। लिहाजा चूल्हा जल गया है और भोजन बनाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। समय दोपहर का एक बज रहा है व्रती के साथ-साथ आसपास के लोग भी कद्दू की सब्जी व भात ग्रहण कर रहे हैं। लोग पूरी श्रद्धा से इस प्रसाद को ले रहे हैं, यह वह प्रसाद है जो साल में केवल एक बार इसी दिन ही नसीब होता है।
निर्माणाधीन झांकी

       शनिवार की शाम को पहला अर्घ्य है ऐसे में छठ घाट की वर्तमान स्थिति को देख लेना आवश्यक है। कुछ लोग घाट का अवलोकन करने पहुंचते हैं पर यह क्या छठ घाट को पूरी तरह से तैयार कर लिया गया है। न केवल छठ घाट की सफाई कर ली गयी है बल्कि घाट जाने के मार्ग को भी दुरूस्त कर लिया गया है। यही नहीं शनिवार को जब व्रती व श्रद्धालु घाट जायेंगे उससे कुछ देर पहले झाड़ू भी चलाया जायेगा ताकि पूरा मार्ग व घाट साथ सुथरा रहेगा और किसी को भी किसी तरह की परेशानी नहीं होगी। कुछ जगहों पर तो भव्य पंडाल बनाया गया है। इन पंडालों की सुंदरता व भव्यता देखते ही बनती है। यही नहीं रथ पर सवार सूर्यदेव की मनमोहक प्रतिमा भी बनायी गयी है। यह ऐसा पर्व है जिसमें न केवल व्रती के परिवार बल्कि गांव के हरेक नागरीक की सहभागिता होती है।
      दिन है नहाय खाय का और शाम के पांच बज चुके हैं, अब अंधेरा पसरने लगा है। ऐसे में एक बार फिर शुरू हो रही है व्रतियों के लिए भोजन बनाने की तैयारी। सामान्य सब्जी व घी लगी रोटी बनायी जाती है। यहां अलग-अलग जगहों में कुछ बदलाव देखा जा सकता है। और इस तरह रात्रि भोजन के साथ ही नहाय खाय के दिन का समापन हो गया। पंचमी को खरना किया जायेगा।

      कुल मिलाकर व्रतियों की दिनचर्या देखकर यह आसानी से बताया जा सकता है कि यह वह पर्व है जिसमें अनुशासन, पवित्रता व श्रद्धा-भाव की अहम भूमिका है। पर्व में न केवल परिवार के सदस्य बल्कि आस पड़ोस के लोग भी बढ़चढ़कर हिस्सा लेते हैं यानी हमें समाजिक जुड़ाव देखने को मिलता है। यही नहीं कठोर पर्व होने के कारण व्रतियों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। ऐसा कम अवसर मिलता है जिसमें इस तरह की पवित्रता व सामाजिक सहभागिता देखने को मिलती है। अव्वल बात तो यह कि किसी भी प्रकार कर्मकांड नहीं, आप छठ घाट पहुंचंे और अपनी बुद्धि व समझ के अनुसार भगवान भास्कर को सरल तरीके से अघ्र्य दें। यहां आराध्य व आराधक के बीच किसी की भी मध्यस्थता नहीं है। न किसी मंत्र और न किसी मूर्ति की आवश्यकता आप यहां साक्षात सूर्यदेव को अर्घ्य प्रदान कर आराधना करते हैं।  






          
                                                                                                                      - दीपक मिश्रा,  देशदुनियावेब

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