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शनिवार, 16 नवंबर 2019

मरजावां - पुराने फार्मूलों की खिचड़ी


फोटो: गूगल सर्च
लेखक निर्देशक मिलाप मिलन जावेरी इससे पहले ‘मस्तीजादे‘ व ‘सत्यमेव जयते‘ का निर्देशन कर चुके हैं। अब उन्होंने मरजावां का निर्देशन किया है। फिल्म देखते हुए पिछली सदी की आठवें दशक की फार्मूला फिल्मों की याद आयेगी, जिसमें नायक को कानून का खौफ नहीं होता था। उन फिल्मों में नायक का प्रतिशोघ की आग में जलना, प्रेम कहानी में खलनायक का आना और ंिहंसा के साथ ढ़ेर सारा एक्शन और भारी भरकम डायलाग होते थे। हीरो की खास स्टाइल उसकी पहचान बनती थी। मिलाप ने भी इन्हीं फार्मूलों का इस्तेमाल किया है।
    क्हानी का आरंभ मुंबई के टैंकर माफिया अन्ना (नासर) की दशहरा पूजा से होता है। उसका दायां हाथ रघु (सिद्धार्थ मल्होत्रा) है। अनाथ रघु को अन्ना ने पाला है। उसका बेटा बिष्णु ( रितेश देशमुख) उसे नापसंद करता है। इसी बीच कश्मीरी लड़की जोया ( तारा सुतारिया) बस्ती में आती है। वह बच्चों का ग्रुप बनाना चाहती है, जो कश्मीर में होने वाले म्यूजीक काॅम्पीटीशन में हिस्सा ले सके। वह रघु को दिल दे बैठती है। घटनाक्रम ऐसे मोड़ लेते हैं कि बिष्णु को कत्ल करते हुए जोया देख लेती है। अन्ना बेटे की खातिर  रघु से जोया को मारने को कहता है। रघु हुक्म की तामील करता है। वह जेल चला जाता है।
    फिल्म में कुछ नयापन नहीं है। कहानी शुरूआत में बिखरी बिखरी लगती है। लेखक माफिया के खौफ रचने में पूरी तरह नाकामयाब रहे हैं। कुछ डायलाॅग के जरिये सांप्रदायिक सौहार्द का मुद्दा छूने का प्रयास किया है। हलांकि वह दिलों को छू नहीं पाता। एसीपी बने रवि किसन द्वारा अन्ना की गिरफ्तारी का सीन हास्यास्पद  है। रधु और जोया के रिष्ते की प्रगाढ़ता को नहीं दिखाया जा सका है। फिल्म में इमोशन की कमी झलकती है। फिल्म में जोया रघु को माउथ आर्गन देती है पर पूरी फिल्म में उसका एक बार भी प्रयोग नहीं हुआ है। फिल्म में रिमिक्स गाना ‘एक तो कम जिंदगानी ... ‘ कर्णप्रिय है।
    ‘मरजावां‘ रोमांटिक एक्शन फिल्म है, पर एक्शन में ऐसा रोमांच नहीं है कि आप एकटक देखते रहें। सिद्वार्थ मल्होत्रा बदले अंदाज में दिखें हैं। उनकी मेहनत भी साफ झलकी है लेकिन कमजोर पटकथा उनकी मेहनत पर पानी फेरती दिखती है। ‘एक विलेन‘ के बाद रितेश एक बार फिर खलनायक के तौर पर आये हैं। उनके किरदार में बौनेपन का काम्पलेक्स है। उनके किरदार का खौफ स्क्रीन पर दिखता नहीं। उनके डायलाॅग भी उन्हें खलनायक की तरह पेश नहीं कर पाते। जोया बनी तारा सुतारिया को सिर्फ खूबसूरत दिखना था, सो वह दिखी हैं। रकुल प्रीत के हिस्से में भी कुछ खास नहीं आया है।
मुख्य कलाकार - सिद्धार्थ मल्होत्रा, रितेश देषमुख, तारा सुतारिया, रकुल प्रीत सिंह, रवि किशन
निर्देशक - मिलाप मिलन जावेरी
अवधि - 2 घंटे 16 मिनट


                                                                                                                              साभार - दैनिक जागरण

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