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मंगलवार, 24 दिसंबर 2019

पावापुरी से निकलेगी छः रि पालित यात्रा

आगामी 18 जनवरी 2020 को छः रि पालित संघयात्रा का आयोजन किया जायेगा। इस यात्रा की शुरूआत जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी के निर्वाणस्थल पावपुरी से होगी। शुरूआत पावापुरी से होगी वहीं समापन मधुबन, शिखर जी में होगा। कार्यक्रम की तैयारी पूरी कर ली गयी है। लगभग 220 किलोमीटर की यह पदयात्रा 18 जनवरी 2020 को पवावपुरी से शुरू होकर 1 फरवरी 2020 को मधुबन में समाप्त हो जायेगी। 2 फरवरी को 20 तीर्थंकरों के निर्वाणस्थल पारसनाथ पर्वत की यात्रा की जायेगी तथा 3 फरवरी को संघ माला रोपण का आयोजन किया जायेगा।

आचार्य सुयश सूरीश्वरजी महाराज की निश्रा में संघयात्रा का आयोजन


         बताया जाता है कि आचार्य सुयश सूरीश्वरजी महाराज की निश्रा तथा गुरू मां पुण्यहर्षलता श्री जी महाराज साहब की प्रेरणा से इस संघयात्रा का आयोजन किया जा रहा है। इस यात्रा में देश के विभिन्न जगहों से भारी संख्या में श्रद्धालुओं के जुटने की संभावना है। यात्रा का रूट तैयार कर लिया गया है। यह पदयात्रा 18 जनवरी को पावापुरी स्थित जलमंदिर से निकलेगी तथा 18 किलोमीटर की यात्रा कर गुणियाजी पहुंच जायेगी। 19 जनवरी को गुणियाजी से निकलकर 15 किलोमीटर की दूरी पार कर महावीर चैक पहुंचेगी। इसी क्रम में मिर्जांगज, लछवाड़, क्षत्रियकुंड, गोटया, साकमगांव, मंडरों, कंदाजोर, घोरंजो, पचंबा, ़ऋजुबालिका होते हुए 1 फरवरी को सम्मेदशिखर पहुंचेंगे। यह पूरी यात्रा लगभग 220 किलोमीटर की होगी। प्रतिदिन लगभग 16 किलोमीटर की यात्रा होगी।
यात्रा रूट

छः रि पालित यात्रा का महत्व

छह प्रकार के नियमों का पालन करते हुए तीर्थों की पदयात्रा करना ही छः री पालित यात्रा है। यह एक प्राचीन परंपरा है जिसमें सामूहीक रूप से लोग तीर्थयात्रा करते हैं। और इस तरह की यात्रा का अपना अलग महत्व है। छह नियम कुछ इस प्रकार हैं जिनका यात्रा के दौरान पालन किया जाता है।
1.    पैदल चलना - इस यात्रा की पहली शर्त यह है कि इसमें पैदल ही चलना होता है। वाहन का प्रयोग नहीं किया जा सकता है।
2.    भूमि शयन - यात्रा के दौरान भूमि पर सोने का नियम है।
3.    एकासना - एकासना अर्थात दिनभर में केवल एक बार भोजन ग्रहण किया जाता है।
4.    सचित्त त्याग - इस नियम के तहत भोजन को जैन दर्शन के अनुसार संस्कारित करके ही ग्रहण किया जा सकता है। बताया जाता है कि सभी प्रकार के वनस्पति बीज आदि यहां तक कि जल में भी जीव पाये जाते हैं। इसलिए इसे सीधे तौर पर ग्रहण नहीं किया जा सकता है।
5.    नित्य क्रिया - यात्रा के दौरान धार्मिक क्रियाओं पर जोर दिया जाता है। यात्रा के दौरान एक श्रद्धालु को देव दर्शन, पूजन, प्रतिक्रमण आदि करते रहना होता है।
6.    ब्रहमचर्य - यात्रा के दौरान ब्रहमचर्य का पालन करना अत्यावश्यक होता है।

कौन कौन होंगे इस यात्रा में शामिल

आचार्य सुयश सूरीश्वर जी महाराज
आचार्य सुयश सूरीश्वर जी महाराज

    इस यात्रा में आचार्य सुयश सूरीश्वर जी महाराज, मुनि विद्याभिक्षु जी महाराज, गुरू मां पुण्यहर्षलता श्री जी महाराज, साध्वी श्री धारिण्यलताश्री जी महाराज, राजलताश्री जी महाराज, मनोज्ञलताश्रीजी महाराज, साध्वी संवरलताश्रीजी महाराज आदि समेत सैकड़ों की संख्या में तीर्थयात्री शामिल होंगे। 

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