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गुरुवार, 16 जनवरी 2020

मधुबन मकर संक्रांति मेला का अनुपम अनुभव

पारसनाथ पर्वत स्थित जलमंदिर में उमड़ी भीड़
9 जनवरी को 'यहां होता है मकर संक्रांति का बेसब्री से इंतजार' शीर्षक वाले एक पोस्ट से झारखंड के गिरिडीह में मकर संक्रांति मेला के बारे में जानाकारी दी थी। पूर्व नियोजित कार्यक्रम के तहत सुबह सात बजे मधुबन पहुंच गया। प्रस्तुत है 15 जनवरी को मेला के अनुभव का विवरण .

                   मधुबन से 15 किलोमीटर पहले ही मेला का आभास होने लगा था। वाहनों की कतार मेला मधुबन की ही ओर जा रही थी वहीं कुछ लोग बाइक से भी जा रहे थे। आलम यह कि उत्साहवश यातायात नियमों को ताक पर रखते हुए एक ही बाइक में तीन लोग सवार होकर जा रहे थे। वहीं चारपहिया वाहनों में छत पर बैठ कर यात्रा का आंनद लेते लोग देखे गए। गिरिडीह - डुमरी मुख्य मार्ग स्थित मधुबन मोड़ से मधुबन का अलग रास्ता है और यहां से मधुबन की दूरी महज चार किलोमीटर है। मोड़ से अंदर दो किलोमीटर का फासला तय करते ही मुझे एक बैरियर मिला जहां चारपहिया वाहनों को पार्किंग स्थल की ओर मोड़ दिया जा रहा था। यहां से बड़े वाहनों को आगे जाने की अनुमति नहीं थी। मैं बाइक से जा रहा था लिहाजा कुछ दूर आगे बढ़ा तो एक और बैरियर मिला जहां बाइक के लिए पार्किंग की जगह बनायी गयी थी। इस जगह से किसी भी तरह का वाहन आगे नहीं जा सकता था।
मैं भी अपनी बाइक पार्किंग कर आगे बढ़ गया। बिरनगड्डा मैदान उतरते ही वहां का नजारा उम्मीद से हटकर था। सामने जर्बदस्त भीड़ थी मानो मानव समुद्र हिलोरं मार रहा हो। पैर रखने तक की जगह नहीं थी। और पीछे से दर्शनार्थियों की भारी भीड़ उमड़ती जा रही थी। मैदान में तरह तरह की दुकानें सजी थी कुछ मिठाई की, कुछ खिलौनों की तो कुछ अन्य सामग्रियों की। न केवल कई तरह की दुकानें थी बल्कि किस्म किस्म के झूले भी थे। इस समय सुबह के सात बज रहे थे और किसी भी व्यक्ति का ध्यान इन दुकानों पर नहीं था। सभी आगे बढ़ रहे थे। मै भी भीड़ के साथ ही आगे बढ़ रहा था। लगभग 20 मिनट बाद मैं पर्वत की तलहटी पर खड़ा था। यही वह जगह है जहां से पारसनाथ पहाड़ की चढ़ाई शुरू होती है।
मेला परिसर का नजारा

                               चूंकि यह जगह मेरे लिए नई नहीं थी, कई बार पर्वत यात्रा भी कर चुका हूं। बावजूद इस खास अवसर का अनुभव लेने के उद्वेश्य से भीड़ का हिस्सा बना रहा। मेरे कदम भी पर्वत की चोटी की तरफ तेजी से बढ़ने लगे। लगभग आधे घंटे बाद मैं पर्वत स्थित भाता घर पहुंच चुका था। यह स्थल गंधर्व नाला के किनारे स्थित है, यहां कुछ दुकानें हैं, जहां पर्वत वंदना करने को ले चढ़ रहे लोग थोड़ा आराम करते है। यहां से चलने के करीब आधा धंटा बाद इस बार मैं सीतानाला पहुंचा। यहां पर रूका नहीं अैर चलता रहा। लगभग 45 मिनट बाद चैपड़ाकुंड पहुंच चुका था। यहां तक मैं अपनी गति से चल रहा था। लेकिन यहां के बाद अपार भीड़ के कारण चलने की बात तो दूर सरकना भी मुश्किल हो गया था। न तो किसी मंदिर में प्रवेश कर पाना संभव था और न ही एक जगह खड़ा हो पाना आसान था। एकबार तो मुझे भी लगा कि बेकार ही इस भीड़ में कूद गया। और फिर तत्काल निर्णय ले लिया कि किसी भी टोंक या मंदिर में अंदर गए बगैर वापस लौट जाउंगा। और ठीक वैसा ही किया। गौतमस्वामी टोंक पहुंचा वहां से फिर पार्श्वनाथ मंदिर के रास्ते से डाकबंगला होते हुए वापस नीचे उतर गया। उतरने में जहां दो घंटे का समय लगता है वहीं मुझे चार घंटे लग गए। दुकानों में भी भारी भीड़ थी। काफी देर की प्रतीक्षा के बाद पानी की बोतल खरीद सका।
पर्वत चढ़ते सैलानी

पर्वत से नीचे उतरने के बाद मधुबन का नजारा भी कुछ ऐसा ही था। मधुबन के मंदिरों में भारी भीड़ थी जिधर नजर धुमती लोगों के सर ही दिखाई दे रहे थे। मुख्य सड़क पर एक - एक कदम बढ़ाना मुश्किल सा हो रहा था। बावजूद मेला दर्शनार्थियों का उत्साह व उमंग देखते ही बन रहा था। वहीं सड़क किनारे . किनारे दर्जनों दुकानें लगी थी। लोग न केवल मंदिरों की सुंदरता व भव्यता को निहार रहे थे बल्कि जमकर खरीददारी भी कर रहे थे।
दोपहर के तीन बज रहे थे।
मैं पुनः बिरनगड्डा के मैदान में था। इस समय यहां भीड़ अपनी चरम स्थिति में थी। दुकानदारी के साथ . साथ झूला का भी लुत्फ उठा रहे थे। इस मेला मैदान का एक चक्कर लगाने के बाद में मकर संक्रांति मेला समिति का कार्यालय भी गया जहां से मेला का संचालन हो रहा था। उसके बाद पार्किंग स्थल गया जहां मेरी बाइक सुरक्षित खड़ी थी।
बता दूं कि यहां मकर संक्राति के अवसर पर मेला का आयोजन होता है। प्रतिवर्ष मकर संक्राति के अवसर पर झारखंड के विभिन्न जगहों से लोग मेला देखने पहुंचते है। एक अनुमान के मुताबिक इस वर्ष लगभग डेढ़ लाख की भीड़ मेला देखने पहुंची थी। यूं तो यह स्थल जैन धर्मावलंबियों का प्रसिद्व तीर्थस्थल है जहां 24 में से 20 तीर्थंकरों ने निर्वाण प्राप्त किया है। यही वजह है कि सालोंभर जैन श्रद्वालु यहां पूजा अर्चना करने पहुंचते हैं।
दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात मकर संक्रांति मेला समिति के सदस्यों की सकियता थी। हरेक सदस्य इस बात का ध्यान रख रहे थे कि किसी भी दर्शनार्थी को किसी भी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। वहीं प्रशासन द्वारा भी ऐंबुलेंसए मेला के दौरान पुलिस जवान हरेक गतिविधि पर नजर बनाए्र हुए थे ताकि किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना न हो। इसके अलावा मेला में गुम हो चुके लोगों को उनके परिजनों से भी मिलाया गया। जो भी होए एकदिवसीय मेला में हजारों की भीड़ तथा हरेक व्यक्ति के चेहरे में मेला को उत्साह व उमंग का भाव देखना अद्वितिय अनुभव था।

मधुबन की दूरी झारखंड की राजधानी रांची से दो सौ किलोमीटर है। बस द्वारा रामगढए हजारीबाग होते हुए यहां आने में चार घंटे का समय लगता है। पारसनाथ स्टेशन (21 किलोमीटर) व गिरिडीह स्टेशन (32 किलोमीटर) निकटतम स्टशेन है


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