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शुक्रवार, 24 जनवरी 2020

नाचने के अलावा और कुछ नहीं करती 'स्ट्रीट डांसर'

 फिल्म - स्ट्रीट डांसर

निर्देशक - रेमो डिसूजा

मुख्य कलाकार - वरूण धवन, श्रद्धा कपूर, प्रभु देवा, अपारशक्ति खुराना, सलमान यूसुफ, राघव जुयाल, नोरा फतेही, मुरली शर्मा, पुनीत पाठक, धर्मेश येलंडे और सुशांत पूजन

जोनर - डांस ड्रामा

अवधि - 150 मिनट 10 सेकेंड

स्ट्रीट डांसर, 2013 में आयी एबसीडी यानी एनीबाॅडी कैन डांस फ्रेंचाइजी की अगली कड़ी है। स्ट्रीट डांसर पूर्णरूप से डांस पर ही  आधारित है। इस फिल्म में इस कदर डांस का तड़का मार दिया गया है कि फिल्म की कहानी हमें प्रभावित नहीं कर पाती है। हलांकिकहानी का विषय अच्छा है, ट्रेलर देखकर आप फिल्म का अंदाजा नहीं लगा पायेंगे। लेकिन कहानी पर ज्यादा जोर न देकर डांस पर दिया गया है ऐसे में आधे से ज्यादा समय तक हम नृत्य, म्यूजीक ही देखते व सुनते रह जाते हैं।

                    फिल्म का नायक सहज (वरूण धवन) भारत का है जो अपने भाई के साथ लंदन में रहता है तथा एक डांसर है। वहीं इनायत  (श्रद्धा कपूर) भी एक डांसर है जो पाकिस्तान से है तथा लंदन में रहती है। सहज व इनायत एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी के रूप में सामने आते हैं। और शुरूआती तीस से पैंतीस मिनट तक दोनों एक दूसरे को नीचे दिखाने में लगे रहते हैं। इसी बीच प्रभुदेवा की इंट्री होती है। प्रभुदेवा  लंदन में अवैध रूप से रह रहे भारत, पाकिस्तान व श्रीलंका जैसे देश के लोगों का दर्द बताते हैं जिससे इनायत पूरी तरह अंजान होती है। यहीं कहानी मोड़ लेती है और यह दर्द जानकर पात्रों को एक मकसद मिल जाता है और वे एक ग्राउंड जीरो नामक कठिन प्रतियोगिता को जीत लेने का संकल्प लेते हैं। प्रतियोगिता जीतना आवश्यक है क्योंकि जीते गए रकम से ही लंदन में फंसे लोगों की सहायता की जा सकती है। हमेशा एक दूसरे से टकराने वाले सहज व इनायत एक साथ हो पाते हैं कि नहीं। प्रतियोगिता जीत वहां फंसे लोगों की सहायता कर पाते हैं या नहीं बस यही कहानी है।
 शुरूआती के तीस मिनट तो हम यूं  ही उछल कूद देखते रह जाते हैं। इंटरवल के बाद दाने दाने को मोहताज लोगों के समूह का दर्द स्क्रीन पर छलकने लगता है। अपने घर से हजारो किलोमीटर दूर रहने की पीड़ा को दर्शानेवाले दृश्य हमें भावुक करते हैं। इंटरवल के बाद हम फिल्म के पात्रों से जुड़ने लगते हैं। वरूण धवन व श्रद्धा कपुर दोनों का अभिनय बढ़िया हैं। पात्र के मन में चल रहे अंर्तद्वंद की भावना को वरूण धवन के चेहरे पर देखा जा सकता है। वहीं प्रभुदेवा एक सिद्धहस्त डांसर के रूप में जंचते हैं।

              केवल खुद के लिए नहीं दूसरों के लिए भी काम करने का संदेश देती है। एक पात्र के अनुसार, ‘वह लम्हा भी इबादत है जब दूसरों के काम आये‘ इस फिल्म की गीत संगीत भी ठीक है। ‘नची नची नची जादू ...‘, ‘आज कोई दुआ करो मेरे लिए ...‘, ‘मुकाबला मुकाबला ....‘ आदि गाने कर्णप्रिय हैं। नये अंदाज में मुकाबला गाना सुनना व इसी गाने में प्रभुदेवा का 3डी संस्करण वाला नृत्य दर्शकों को लुभाता है। फिल्म के क्लाइमैक्स सॉन्ग ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा‘ दिल छू लेता है।

           फिल्म में कुछ कमी भी है और इन कमियों की बात करें तो हम हद से ज्यादा डांस देखते हैं। बात-बात पर डांस शुरू हो जाता है। एक पेशेवर डांसर व नृत्यकला में गहरी समझ रखने वाले व्यक्ति के लिए भले ही एक अलग अनुभव हो। पर एक सामान्य दर्शक के लिए केवल डांस देखना व म्यूजीक के नाम पर शोर सुनना उबाउ व बोझिल लगने लगता है। डांस को कम कर कहानी में कसावट लाने की जरूरत थी। इमिग्रेंटस के दर्द को ओर बेहतर ढंग से दर्षाया जा सकता था। संवाद भी आपको प्रभावित नहीं करता है। हंसाने के उद्वेष्य से बोले गये कोई संवाद ऐसे नहीं हैं जो हमें नये लगते हों।

डांस देखने के लिए इस फिल्म को देखने जा सकते हैं।
मेरी राय में इस फिल्म की रेटिंग - 3.5

                                                                                                                  - दीपक मिश्रा, देशदुनियावेब

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