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बुधवार, 8 जनवरी 2020

यात्रा पवित्रभूमि तारापीठ की, भाग - 1

तारापीठ मंदिर
इस ब्लाग में रजरप्पा सिद्धपीठ व पथरोल काली मंदिर से संबंधित यात्रा वृतांत लिख चुका हूं। यह संयोग ही है कि इन स्थलों के बाद तारापीठ काली मंदिर की यात्रा का अवसर मिला। इस तरह रजरप्पा के बाद पथरोल और अब तारापीठ की यात्रा का अनुभव साझा कर रहा हूॅं। तारापीठ एक महापीठ है। पीठस्थान चार प्रकार के होते हैं - महापीठ, पीठ, उपपीठ व सिद्धपीठ। महापीठ उस स्थान को कहते हैं जहां सती के शरीर के अंग गिरे हो और साधकों ने सिद्धिलाभ करके उन जगहों को प्रसिद्ध करने में मदद की हो। तारापीठ 51 पीठ में से नहीं है लेकिन 108 पीठ में से एक है।
      तारापीठ पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले में स्थित है। यहां जाने के लिए मैं सबसे पहले झारखंड के गिरिडीह जिला स्थित पारसनाथ स्टेशन पहुंचा। गया आसनसोल पैसेंजर से धनबाद जंक्शन पहुंचा। रात 11 बजे वनांचल एक्सप्रेस धनबाद जंक्शन पहुंची और मैं इस ट्रेन में सवार हो गया। सीट पहले से रिजर्व थी लिहाजा मैं अपनी तय सीट पर बैठ गया। कुछ ही देर में ट्रेन अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गयी। सुबह के लगभग चार बज रहे थे और वनांचल एक्सप्रेस रामपुर हाट स्टेशन पर रूक चुकी थी। लगभग पांच मिनट बाद जब स्टेशन से बाहर निकला तो सीधे मंदिर तक जाने के लिए कोई गाड़ी नहीं थी। दो- तीन आॅटो वाले मिले लेकिन काली मंदिर तक जाने से मना कर दिया। ठंढ़ होने की वजह से बाहर में सहजता से घूमा भी नहीं जा रहा था। दो तीन आॅटो खड़ा था पा आॅटो वाले ने कहा कि जब तक गाड़ी भर नहीं जाती तब तक नहीं जायेंगे ऐसे में आपको इंतजार करना पड़ेगा। कब तक ? इसका कोई निश्चित समय नहीं है।
रामपुर हाट स्टेशन

   इसी बीच एक इरिक्शा मिला और रिक्शा चालक ने कहा कि चार बजे सुबह मंदिर जाने के लिए कोई पैसेंजर नहीं है। ऐसे में रिक्शा रिजर्व करना पड़ेगा। एक सौ रूप्ये किराया तय हुआ और वह मुझे तारापीठ ले जाने को तैयार हो गया। स्टेशन से निकलते ही सड़कों पर केवल सन्नाटे से ही सामना हो रहा था। चारो ओर सन्नाटा पसरा हुआ था। घूप्प अंधेरे में टिमटिमाती रौशनी के साथ रिक्शा आगे बढ़ रहा था, वहीं सन्नाटा ऐसा कि केवल इंजन की आवज ही गूंज रही थी। लगभग 15 मिनट के सफर के बाद रिक्शा ऐसे जगह पहुंचा जहां चारों ओर होटल और धर्मशाला थे। और अब मै माॅ तारा की पवित्र भूमि तारापीठ में खड़ा था। मंदिर के समीप ही एक पुरानी धर्मशाला में कमरा मिल गया। अब तक सुबह के पांच बज चुके थे।
  लगभग तीन घंटे के विश्राम के बाद मंदिर व मंदिर में पूजा करने के समय से संबंधित जानकारी लेने के लिए अपने कमरे से बाहर निकला। पूरी जानकारी तो धर्मशाला के प्रबंधक से ही मिल गयी, इसके अलावा एक प्रसाद की दुकान में बैठै दुकानदार ने भी कई जानकारी दी। आमतौर पर किसी भी सनातन मंदिर में पूजा करने से पहले आपको उपवास रखना पड़ता है। यानी अन्न-जल ग्रहण किए बिना स्नान करें और पूजा के लिए मंदिर में प्रवेश करें उसके बाद  पूजा दर्शन करें। लेकिन यहां आप खा-पीकर भी मंदिर में पूजा कर सकते हैं। बशर्ते आपको भोजन के बाद स्नान करना होगा और शुद्ध वस्त्र धारण करना होगा।
                          वैसे मैं मंदिर देखने को ले काफी उत्सुक था। धर्मशाला से बाहर निकलने पर पाया कि अब तक हर तरह की दुकानें खुल चुकी थी। सड़कों पर भक्तों की भीड़ थी। कुछ ही देर में मंदिर के सामने पहुंच चुका था। मंदिर की भव्यता देखते ही बन रही थी। समय के साथ मंदिर के प्रवेश द्वार पर भक्तों की चहलकदमी भी बढ़ती जा रही थी। मैंने भी दो घंटे बाद पूजा करने के उद्वेश्य से पुनः मंदिर आने की योजना बनाकर वापस अपनी धर्मशाला चला गया।                        
                                                                                                                                                 क्रमशः

                                                                                                                   - दीपक मिश्रा, देशदुनियावेब

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