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बुधवार, 15 जनवरी 2020

यात्रा पवित्र भूमि तारापीठ की, भाग - 2

मां तारा की प्रतिमा

 तारापीठ यात्रा वृतांत के पहले भाग में तारापीठ स्थित एक धर्मशाला में पहुंचने तक का विवरण दे चुका हूं। मंदिर, मंदिर का माहौल, धर्मशाला से मंदिर की दूरी, पूजन विधि आदि की जानकारी लेने के बाद वापस धर्मशाला आ गया। और स्नान आदि से निवृत होकर पूजा के लिए मंदिर की ओर निकल पड़ा। हलांकि आप खा पीकर भी पूजा अर्चना कर सकते हैं। पर मैनें ऐसा नहीं किया, यह मेरा व्यक्तिगत निर्णय था। 

अगर आपने तारपीठ यात्रा का पहला भाग नहीं पढ़ा है तो पढ़नें के लिए यहां क्लिक करें। 

मंदिर जानें का मार्ग
मंदिर जानें का मार्ग
पूजन सामग्री की दुकान
पूजन सामग्री की दुकान
मंदिर का प्रवेश द्वार
मंदिर का प्रवेश द्वार

 मंदिर के आसपास प्रसाद व अन्य सामग्रियों की कई दुकान हैं। प्रसाद व पूजन सामग्री खरीद लें उसके बाद मंदिर प्रवेश करें। प्रसाद व अन्य पूजन सामग्री यथा पुष्प, पुष्पमाला, मौली, आदि लेकर में भी मंदिर के अंदर प्रवेश कर गया। मंदिर के अंदर का नजारा देखने लायक था। भक्तों की खचाखच भीड़ थी। एक तरफ श्रद्धालुगण कतारबद्ध होकर अपनी बारी की प्रतिक्षा कर रहे थे। रह रह कर ‘जय मां तारा‘ के गगनभेदी जयकारे भी लगाये जा रहे थे। जब आप पहली बार किसी भव्य मंदिर में प्रवेश करते हैं तो उत्सुकता इतनी बढ़ जाती है कि लगता है जल्द से जल्द मंदिर का एक-एक कोना देख लूं। पर इतनी भीड़ थी कि मंदिर प्रांगण में हो रही अन्य गतिविधियों को भी देख पाना मुश्किल था।
माता के दरबार में

माता के दरबार में

 खैर, मां की कृपा से मेरी भी बारी आयी और मैं भी गर्भगृह में प्रवेश कर गया माता के दर्शन हुए। विधिवत पूजा की और बाहर आ गया। मंदिर के अंदर बीता वह कुछ पल मुझे ताउम्र याद रहेगा। बाहर निकलते ही मनोदशा ऐसी थी जिसका जिक्र नहीं कर सकता। क्योंकि इससे पहले  मैं बहुत लोगों से यह सुन चुका था कि भारी भीड़ के कारण दर्शन-पूजा की बात तो दूर गर्भगृह में प्रवेश कर पाना मुश्किल होता है।
       यह मंदिर काफी प्राचीन है। जानकार बताते हैं कि मां तारा का प्रथम मंदिर का निर्माण जयदत्त सौदागर ने किया था। पर बदलते समय के साथ मंदिर में काफी बदलाव आये। पुर्ननिर्माण, जीर्णोद्वार का क्रम चलता रहा। एक लंबा इतिहास है।
          दोपहर बारह बजे से एक बजे बीच मां को भोग अर्पित किया जाता है। उसके बाद दोपहर में मंदिर का कपाट बंद कर दिया जाता है। तीन बजे के बाद कपाट खोल दिया जाता है और पूजा शुरू हो जाती है।
   

      शाम को संध्या आरती होती है और रात दस बजे मंदिर बंद हो जाता है। कुछ खास मौके पर जैसे महीने के (दोनों पक्ष कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष के) दो अष्टमी तीथी, दोनों चतुर्दशी, पूर्णिमा, अमावस्या और संक्रांति पर रात्रि में विशेष पूजा आरती व भोग निवेदन का आयोजन किया जाता है। धूम्रपान व मद्यपान करके, चमडे़ का बैग, बेल्ट आदि लेकर, रोग से पीड़ित शिशुओं का मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करना मना है। माता की तस्वीर लेने की भी मनाही है।
      मां तारा की पूजा करने के बाद मंदिर के ठीक सामने स्थित जीवित कुंड गया। सभी भक्तगण जीवितकुंड की पूजा कर रहे थे। कोई धूप, दीप तो कोई अगरबत्ती दिख रहा था। बताया जाता है कि पूर्व में इस कुंड के जल से मां का स्नानाभिषेक किया जाता था एवं  इसी कुंड के पवित्र जल से मां तारा का भोग बनता था। पर समय के साथ कुंड का जल दुषित हो गया। अब केवल श्रद्धाभाव से भक्तगण अपने उपर इस जल को छिड़कते हुए नजर आते हैं। इस कुंड की बहुत महिमा है। कहा जाता है कि रातगड़ा के सौदागर जयदत्त अपने पुत्र व अन्य नाविको के साथ द्वारका जलपथ से गुजर रहे थे। इसी क्रम में वे यहां उतरते हैं और दुर्भाग्यवश एक सांप जयदत्त के पुत्र धनंजय को काट लेता है और उसकी मौत हो जाती है। इसी बीच नाविकों को इस कुंड के बारे में जानकारी मिलती है जहां कटी हुई शोल मछली इस कुंड के जल में जाते ही जीवित हो जाती है। वे धनंजय को केले के पत्ते से बनी एक नाव में सुलाकर कुंड के पानी में छोड़ देते हैं। और इसका चमत्कारिक प्रभाव यह होता है कि मृत धनंजय जीवित हो उठता है। यह जीवितकुंड, ब्रहमकुंड व सुधा कुंड के नाम से भी जाना जाता है। भले ही अब कोई मृत इस जल के प्रभाव से जीवित न होता हो। पर अब भी लोग इसे प्राणदायिनी कुंड के रूप में मानते हुए इसके समक्ष नतमस्तक होते हैं। वहीं कई ऐसे लोग भी हैं जो यह कहते मिल जायेंगे कि उन्होंने पूरी आस्था से स्नान किया और उनकी व्याधियां चली गयी। 
कुंड के समक्ष जलायी जा रही अगरबत्ती

मनोकामना के लिए बांधी गयी मौली
      कुंड के समीप ही आपको मौली बेचते हुए कई व्यक्ति नजर आयेंगे। मौली बेच रहे लोगों के अनुसार मौली (एक प्रकार का धागा )  खरीदीए और अपनी मनोकामना को ध्यान में रखते हुए मौली एक खास जगह पर बांध दीजिए। आपकी मनोकामना पूरी हो जायेगी पर शर्त यह है कि मनोकामना पूरी होने पर आपको यह मौली खोलने आना होगा। यह परंपरा व्यवसाय के उद्वेश्य से शुरू किया गया है या फिर इसमें सत्यता है इस पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता। वैसे भी आस्था में तर्क का कोई स्थान नहीं है।
मंदिर प्रांगण स्थित एक अन्य मंदिर

      मंदिर प्रांगण मं कई छोटे-बड़े मंदिर हैं। प्रांगण के एक ओर मां तारा का मंदिर है तो ठीक दूसरी ओर कुंड। आंगन में एक शिव मंदिर भी है जिसे चंद्रचूड़ शिव मंदिर कहा जाता है। चंद्रचूड़ नामक एक  भक्त ने यहां शिवजी को प्रतिष्ठित किया था। शिवमंदिर के समीप ही बिष्णुमंदिर है जहां बिष्णु के वाहन गरूड़ व हनुमान जी की प्रतिमायें हैं। वहीं मां तारा के साधक बामाखेपा बाबा की मूर्ति भी है। घाट से उठकर दायीं तरफ एक मंदिर है जहां षष्टीमाता की पूजा की जाती है। समीप ही यज्ञादि करने के लिए स्थल बना हुआ है। ठीक उसी के समीप बकरे की बली दी जाती है। जिस चीज पर बली दी जाती है स्थानीय भाषा में उसे हाड़ीकाठ बोलते हैं।
      इसके अलावा भी बहुत कुछ है पर पूजा के दौरान बिताये गये चंद मिनटों में सब कुछ समझ पाना बहुत मुश्किल है। हलांकि मुझे एक अच्छे पुजारी (पंडा) मिल गये जिनके दिशा निर्देश में मैं दर्शन-पूजा कर सका और उनके द्वारा बतायी गयी जानकारी के आधार पर ही मैं उपर्युक्त विवरण आपसे साझा कर पा रहा हूं। दर्शन पूजा के साथ मैं मंदिर परिसर से बाहर निकल गया। शाम को मंदिर से कुछ दूरी पर स्थित महाश्मशान स्थित चितास्थल गया। महाश्मशान के बारे में भी कहने को बहुत कुछ है। पर इस पोस्ट में श्मशान का विवरण देना नहीं चाहता हूं। इससे यह पोस्ट काफी लंबा व उबाउ हो जायेगा। तारापीठ यात्रा की अगली कड़ी में श्मशान, समीप के ही एक भव्य मंदिर व अन्य आवश्यक जानकारी देने की कोशिश करूंगा।
    तारापीठ महाश्मशान, व अन्य मंदिरों के दर्शन करने के बाद एक बार फिर मां तारा का मंदिर गया। मंदिर में संध्या आरती होती है। आरती देखने का अनुभव भी काफी अनुपम है। आरती से पहले भक्तों का हुजूम मंदिर के समक्ष हाथ जोड़े खड़ा हो जाता है। आरती के दौरान माता का दर्शन भलिभांति हो सके इसके लिए लोग आगे खड़े हो जाते हैं। और आगे जगह मिले इस उद्वेश्य से समय से पहले पहुंच जाते हैं। बताते हैं कि शनिवार और मंगलवार को बहुत ज्यादा भीड़ होती है। आरती के दौरान माता का पट खुलता है और माता का दर्षन होता है। माता की आरती से पूरे मंदिर का माहौल गूंजायमान हो जाता है। और उस क्षण मंदिर परिसर में खड़ा होकर माता का दर्षन करने का अनुभव अद्वितीय है जिसे शब्दों से बयान नहीं किया जा सकता। आरती के बाद माता का प्रसाद प्राप्त हुआ जो भक्तों के बीच वितरित किया जा रहा था। आरती के बाद मैं मंदिर से बाहर निकल आया। मन में यह विचार आ रहा था कि न जानें दूबारा इस मंदिर में आने का मौका कब मिलेगा। मां तारा मंदिर की यह मेरी पहली यात्रा थी।

                                                                                                             - दीपक मिश्रा,  देशदुनियावेब 

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