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शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

छः री पालित यात्रा संघ का मंगल प्रवेश

पदयात्रा के दौरान आचार्य श्री
मधुबन, गिरिडीह (झारखंड) :  शनिवार, एक फरवरी को मधुबन में छः री पालित संघयात्रा का मंगल प्रवेश हुआ। धार्मिक भजनों व प्रभु के जयकारों से मधुबन का माहौल भक्तिमय हो गया। सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालुगण आचार्य सुयश सूरी जी महाराज के सान्निध्य में पदयात्रा कर रहे थे। लगभग 220 किलोमीटर की पदयात्रा पूरी कर मधुबन पहुंचने की खुशी का भाव श्रद्धालुओं के चेहरे पर सहजता से देखा जा सकता था। पहली बात तो यह कि सफलतापूर्वक 220 किलोमीटर की पदयात्रा पूरी कर ली थी तथा दूसरी यह कि उस स्थल तक पहुंच चुके थे जहां 24 में से 20 तीर्थंकरों ने साधना करते हुए मोक्ष प्राप्त किया है। यह यात्रा बीते 18 जनवरी को बिहार के पावापुरी से शुरू की गयी थी।
 
          इस यात्रा की शुरूआत जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी के निर्वाणस्थल पावपुरी से की गयी तथा समापन मधुबन, शिखर जी में हुआ। कार्यक्रम की तैयारी बीते कई दिनों से की जा रही थी। एक फरवरी को जहां संघ प्रवेश  समेत दर्जनाधिक धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए वहीं 2 फरवरी को 20 तीर्थंकरों के निर्वाणस्थल पारसनाथ पर्वत की यात्रा की जायेगी। तीन फरवरी को संघ माला रोपण का आयोजन किया जायेगा।
             बताया जाता है कि आचार्य सुयशसूरीश्वरजी महाराज की निश्रा तथा गुरू मां पुण्यहर्षलता श्री जी महाराजा साहब की प्रेरणा से इस संघयात्रा का आयोजन किया गया। इस यात्रा में देश के विभिन्न जगहों से भारी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। पदयात्रा 18 जनवरी को पावापुरी स्थित जलमंदिर से निकलकर 18 किलोमीटर की यात्रा करते हुए गुणियाजी पहुंची। 19 जनवरी को गुणियाजी से निकलकर 15 किलोमीटर की दूरी पार कर महावीर चौक पहुंची। इसी क्रम में मिर्जांगज, लछवाड़, क्षत्रियकुंड, गोटया, साकमगांव, मंडरों, कंदाजोर, घोरंजो, पचंबा, ़ऋजुबालिका होते हुए 1 फरवरी को सम्मेदशिखर पहुंची। प्रतिदिन जहां-जहां पड़ाव होता गया वहां भी धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए साथ ही ग्रामीणों को आचार्य श्री व गुरू मां ने धर्मोपदेश भी दिया।

छः री पालित यात्रा का महत्व

छह प्रकार के नियमों का पालन करते हुए तीर्थों की पदयात्रा करना ही छः री पालित संघयात्रा है। यह एक प्राचीन परंपरा है जिसमें सामूहीक रूप से लोग तीर्थयात्रा करते हैं। और इस तरह की यात्रा का अपना अलग महत्व है। छह नियम कुछ इस प्रकार हैं जिनका यात्रा के दौरान पालन किया जाता है।
1.    पैदल चलना - इस यात्रा की पहली शर्त यह है कि इसमें पैदल ही चलना होता है। वाहन का प्रयोग नहीं किया जा सकता है।
2.    भूमि शयन - यात्रा के दौरान भूमि पर सोने का नियम है।
3.    एकासना - एकासना अर्थात दिनभर में केवल एक बार भोजन ग्रहण किया जा सकता है।
4.    सचित्त त्याग - इस नियम के तहत भोजन के जैन दर्षन के अनुसार संस्कारित करके ही ग्रहण किया जा सकता है। बताया जाता है कि सभी प्रकार के वनस्पति बीज आदि यहां तक कि जल में भी जीव पाये जाते हैं। इसलिए इसे सीधे तौर पर ग्रहण नहीं किया जा सकता है।
5.    नित्य क्रिया - यात्रा के दौरान धार्मिक क्रियाओं पर जोर दिया जाता है। यात्रा के दौरान देव दर्शन, पूजन, प्रतिक्रमण आदि करते रहना है।
6.    ब्रहमचर्य - यात्रा के दौरान ब्रहमचर्य का पालन करना अत्यावश्यक होता है।
कौन कौन थे इस यात्रा में
    इस यात्रा में आचार्य सुयश सूरीश्वर जी महाराज, मुनि विद्याभिक्षु जी महाराज, गुरू मां पुण्यहर्शलता श्री जी महाराज, साध्वी श्री धारिण्यलताश्री जी महाराज, राजलताश्री जी महाराज, मनोज्ञलताश्रीजी महाराज, साध्वी संवरलताश्रीजी महाराज आदि श्रमणी वृंद समेत सैकड़ों की संख्या में तीर्थयात्री शामिल थे। 

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