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बुधवार, 4 मार्च 2020

हावड़ा-मुंबई मेल की यात्रा का यादगार अनुभव

हावड़ा - मुंबई मेल
फरवरी- 2020 में यात्रा की एक श्रृंखला रही। आमतौर पर किसी एक स्थल पर जाता हूं चाहे वह तीर्थस्थल हो या फिर पर्यटक स्थल और उस स्थल से फिर वापस घर आ जाता हूं। उसके बाद उस यात्रा का विवरण आपसे साझा करता हूं। इस बार की मेरी यात्रा काफी लंबी थी, इस क्रम में मैनें कई शहरों, प्रसिद्ध मंदिरों व अन्य दर्शनीय स्थलों को करीब से देखा। महज एक पोस्ट में पूरा वृतांत नहीं लिखा जा सकता इसलिए विभिन्न स्थलों का विवरण आपको किस्तों में मिलेगा। यात्रा का अंतिम पड़ाव मुंबई था।
जब एक ही बार में कई दर्शनीय स्थलों का दर्शन करने की योजना बनाते हैं तो आपकी यात्रा स्वभाविक रूप से लंबी होगी। और लंबी यात्रा की तैयारी में समय भी लगता है। बहुत कम ही ऐसा देखने को मिलता है कि अनायास ही आप एक लंबी यात्रा पर निकल गये हो। लंबी यात्रा में आप कई बार ट्रेनों को बदलेंगे और हर एक ट्रेन में आपको कंफर्म सीट मिल जाये इसके लिए आवश्यक है कि आप कम से कम तीन माह पूर्व ही टिकट ले लंे। क्रम से एक साथ कई दर्शनीय स्थलों को जानने व समझने के लिए रेल एक उपयुक्त माध्यम है।
पारसनाथ पर्वत का नजारा
मधुबन का विहंगम दृश्य

मैं झारखंड स्थित गिरिडीह जिला के मधुबन में रहता हूं। मधुबन झारखंड के सर्वोच्च पर्वत पारसनाथ की खूबसूरत वादियों में बसा मंदिरों व धर्मशालाओं की नगरी है। यह स्थल जैन धर्मावलंबियों का प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। जैन शास्त्रों व जानकारों के अनुसार पारसनाथ पर्वत 24 में से 20 तीर्थंकरों का निर्वाण स्थल है। इस ब्लाॅग में मैनें इस स्थल का पूरा व्यौरा दिया है। साथ ही पारसनाथ पर्वत यात्रा वृतांत भी पोस्ट किया है। आप चाहे तो निम्न लिंकों पर क्लिक कर पूरा विवरण पढ़ सकते हैं।
यात्रा जैन धर्मावलंबियों के प्रसिद्ध तीर्थस्थल मधुबन की

यात्रा वृतांत : पारसनाथ पर्वत की भक्तिपूर्ण व रोमांचक यात्रा
मधुबन मेरा घर है लिहाजा हर एक यात्रा की शुरूआत मधुबन से होती है। और यह यात्रा भी मधुबन से ही शुरू होती है। इस आलेख को आप ‘मुबंई यात्रा वृतांत‘ की पहली किस्त के रूप में भी पढ़ सकते हैं। मुंबई पहुंचने के क्रम में जिन-जिन स्थलों का दर्शन किया है उन सभी का विवरण मैं अलग-अलग पोस्ट में करूंगा।
मेरी सीट  हावड़ा - मुंबई मेल के एसी 2 टियर कोच में आरक्षित थी। नजदीकी स्टेशन पारसनाथ स्टेशन है जिसकी दूरी 22 किलोमीटर है। पारसनाथ में मुंबई हावड़ा मेल का समय रात के 2ः58 बजे है, रात दस बजे हावड़ा जंक्शन से खुलती है तथा पांच घंटे में पारसनाथ पहुंचती है। मधुबन से पारसनाथ जाने के लिए रात में आवागमन की सुविधा नहीं है ऐसे में पारसनाथ स्टेशन में देर रात आपकी कोई ट्रेन हो तो आपको शाम को ही निकलना पड़ेगा। और में भी शाम 9 फरवरी को स्टेशन के लिए निकल गया।
पारसनाथ स्टेशन का मुख्य द्वार

शाम के 6 बज रहे हैं और मैं इसरी बाजार में हूॅं। यहां बताना चाहूंगा कि स्टेशन का नाम पारसनाथ है और जिस स्थल पर यह स्टेशन स्थित है वह इसरी बाजार के नाम से जाना जाता है। कभी-कभी बाहर से आने वाले लोग इस बात पर भ्रमित भी हो जाते हैं। इसरी बाजार में कई जैन धर्मशालायें हैं। जैसा कि आपको बताया मधुबन-पारसनाथ जैन धर्मावलंबियों का विश्वप्रसिद्ध तीर्थस्थल है और पारसनाथ स्टेशन निकटतम रेलवे स्टेशन है लिहाजा यहां तीर्थयात्रियों की भीड़ रहती है। श्वेतांबर व दिगंबर समाज के अलग अलग धर्मशालायें हैं। मैं भी एक धर्मशाला में ठहर गया। ठहरने का शुल्क काफी साधारण है।
 अभी रात के दो बज रहे हैं। अलार्म बजते ही मैं उठ गया। हलांकि मैनें पहले ही संस्था के एक कर्मचारी को दो बजे उठा देने को कहा था और यह भी बता दिया था कि मुझे किस गाड़ी से निकलना है। लेकिन खुद से एहितयात बरतते हुए अपने मोबाइल में भी अलार्म सेट कर लिया था। क्या पता कहीं कर्मचारी उठाना भूल गया तो। हलांकि लगभग दस मिनट बाद कर्मचारी मुझे उठाने आया है लेकिन अब मैं अपनी यात्रा के लिए पूरी तरह तैयार हो चुका हूं।
दो बजकर बीस मिनट हो रहे हैं और मैंने कमरा खाली कर दिया है। स्टेशन यहां से बिल्कुल नजदीक है। स्टेशन की ओर पैदल ही आगे बढ़ रहा हूॅ। स्टेशन में हो रही घोषणा की आवाज स्पष्ट रूप से सुन रहा हूॅं। हावड़ा मुंबई मेल समय पर चल रही है।
प्लेटफार्म संख्या तीन

और ये मैं आ गया प्लेटफार्म संख्या तीन पर। यहां का नजारा मेला सा है। सभी हावड़ा-मुंबई मेल के ही सवारी हैं। अधिकांश लोग मुंबई जाकर काम करने वाले हैं। इनमें से कुछ ऐसे भी हैं जो पहली बार मुंबई अपनी किस्मत आजमाने जा रहे हैं ताकि उन्हें वहां कोई ढंग का काम मिले और कुछ पैसे कमा सके। क्योंकि उनके अपने गांव में उनके लिए कोई काम नहीं है। काम के सिलसिले से जो भी जा रहे हैं सभी का यही रोना है। यह एसी तस्वीर है जो हर रोज इस प्लेटफार्म में इस गाड़ी के आने के समय दिखाई देती है। सरकार बदलती है दावें होते हैं पर मुंबई जैसे शहरों की ओर काम की तलाश में युवकों को जाने की मजबूरी खत्म नहीं होती। अगर उनके गांव में ही रोजगार के साधन होते तो यह सब कुछ झेलना नहीं पड़ता। कुछ लोग वैसे लोगों को एकदम आगे जाने की सलाह दे रहे हैं जिनके पास रिजर्वेशन टिकट नहीं है और जेनरल बोगी सबसे आगे होती है। इस बात का भी संकेत दे दे रहे थे कि जेनरल बोगी में चढ़ पाना और अंदर टिके रहना किसी जंग से कम नहीं है। वहीं आपस में बात कर रहे दो युवक टिकट लेने में होने वाली परेशानी को बयां कर रहे थे। कैसे इस ट्रेन की सभी सीटें बूक हो जाती हैं और तत्काल के अलावा कोई विकल्प नहीं बच जाता है। तत्काल में टिकट लेने में क्या फजीहत होती है वह वही जानता है जो टिकट लेता है। फरवरी का दूसरा सप्ताह और ऐसी ठंढ़ी हवा बह रही है कि प्लेटफार्म पर खड़ा रहना मुश्किल हो रहा है।
घोषणा होती है कि हावड़-मुंबई मेल प्लेटफाम तीन पर आ रही है। घोषणा सुनते ही भीड़ में खलबली मच जाती है। सभी खड़े हो जाते है। सभी उन तय स्थलों पर खड़े हो जाते हैं जहां डिस्प्ले के अनुसार बोगियां लगेंगी। उनलोगों को चेहरे पर चिंता की लकीरें स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है जो जेनरल बोगी में चढ़ने वाले हैं इनके पास सामान भी है जो टेंशन बढ़ाने के लिए काफी है। कुछ का रिजर्वेशन कंफर्म नहीं हुआ है वो भी भावी यात्रा को ले सोच में डूबे हैं। घोषणा हुए पांच मिनट हो गए पर अभी तक गाड़ी नहीं आयी है।
ट्रेन की लाइट नजर आने लगी है, सभी की नजरें गाड़ी पर टिक गयी है। लोग अपने-अपने सामान लेकर गाड़ी पर सवार होने को ले पूरी तरह तैयार हो गये हैं। कुछ ही क्षणों में गाड़ी सरकती हुई अपने नियत समय पर आकर रूक गयी। गाडी के रूकते ही यात्रियों में हलचल मच जाती है। जल्दी से जल्दी से अपने समान के साथ बोगी के अंदर हो जाना चाहते थे। जल्दबाजी इतनी कि एक मिनट के दरम्यान ही सभी अंदर आ चुके थे। पूरा प्लेटफार्म खाली हो चुका था। लगभग दो मिनट बाद ट्रेन फिर से अपने गंतव्य की ओर सरकने लगती है तथा अपने पीछे छोड़ जाती है कुछ देर के लिए सन्नाटा। जबतक कि अगली गाड़ी के लिए उसी प्लेटफार्म पर यात्रियों की भीड़ न हो।
मैं अपनी सीट लोअर बर्थ पर  आ चुका हूॅं। सीट पूरी तरह से तैयार है और अब मैं सोने की कोशिश कर रहा हूॅ। गाड़ी में सवार हुए लगभग आधा घंटा ही हुआ है और गाड़ी हजारीबाग रोड पहुंच गयी है। यहां भी मुंबई जाने वालों की काफी भीड़ है। उन सब चीजों की पुनारावृति होती है जो पारसनाथ स्टेशन में दिखा था। हजारीबाग रोड से गाड़ी खुल गयी है और पूरी रफ्तार से अपने गंतव्य की जा रही है।


अभी गाड़ी पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्टेशन पहुंची है और यहीं मेरी नींद खुल जाती है। स्टेशन आने जाने का सिलसिला जारी रहता है। इसी क्रम में चुनार, मिर्जापुर, विंध्याचल, इलाहाबाद चैकी, नैनी, षंकरगढ़, सतना, मैयहर, कटनी, जबलपुर, श्रीधाम आदि स्टेशन पार करती है और मेरी यात्रा का एक दिन समाप्त हो जाता है।
रात के तीन बज रहे हैं और मैं भुसावल जंक्शन पर उतर जाता हॅंू। इस सफर में हावड़ा-मुंबई मेल का साथ यहीं तक का था। रात का समय है लिहाजा प्लेटफार्म पर ज्याद भीड़ नहीं है। इस बीच एक यात्री से मुलकात होती है जो अपने परिजनों के साथ सुरत जा रहे हैं और गाड़ी के बारे बताते हैं। कहते हैं कि सुबह आठ बजे नवजीवन एक्सप्रेस है लेकिन उसके जेनरल बोगी में इतनी भीड़ होती है कि उसमें चढ़ना ही बहुत मुश्किल है। 8ः45 बजे भुसावल-सुरत पैसेंजर है उसमें आसानी से सीट मिल जाती है लेकिन यह सुरत बहुत देर से पहुंचती है। खैर, मैरी टिकट उसी पैसेंजर के एस 1 में कंफर्म थी। मेरे पास काफी समय था सो मैनें स्टेशन में ही घूमना शुरू कर दिया। वैसे भी नयी जगह में जिज्ञासा भी चरम पर होती है। ठीक 24 घंटे पहले जब मैं पारसनाथ में था तो वहां इतनी ठंढ़ थी कि खड़ा रह पाना भी मुश्किल हो रहा था। यहां भी ठंढ़ है पर पारसनाथ जैसी हाड़ कंपा देने वाली ठंढ़ नहीं है।
भुसावल जंक्शन

भुसावल उतरते ही मराठी सुनने को मिलने लग जाती है। कई तीर्थयात्री भी थे पारसनाथ से तीर्थयात्रा कर अपने घर वापस लौटने के क्रम में यहां उतरे थे। भुसावल जंक्शन एक महत्वपूर्ण जंक्शन है। और भारतीय रेलवे के सौ शीर्ष बूकिंग स्टेशनांे में से एक है। लगभग चालीस ट्रेनें यहां से खुलती है तथा प्रतिदिन 289 ट्रेनें यहां से होकर गुजरती है।
6 बज रहे हैं और भुसावल-सुरत पैसेंजर  पूरी तरह से तैयार होकर प्लेटफार्म पर खड़ी है। अपने नियत समय यानी ठीक बजे नवजीवन एक्सप्रेस आ गयी। एक बार तो ऐसा लगा कि क्यों न जेनरल में ही बैठकर थोड़ी जल्दी पहुंच जाउं। पर बोगी का नजारा देख उसमें चढ़ने की हिम्मत नहीं हुई। पैर रखने तक की जगह नहीं थी। वैसे भी मेरे पास बहुत समय था और अगली गाड़ी की कंफर्म टिकट थी। ऐसे में परेशानी उठाने की क्या जरूरत।
ठीक साढ़े आठ बजे मैं अपनी सीट पर आ गया। 8ः45 होते ही गाड़ी अपने गंतव्य की ओर रवाना होती है और इसी के साथ षुरू होती है मेरी एक ओर ट्रेन यात्रा। पूरी तरह से आरामदायक पर धीमी। हर एक स्टेशनों पर रूकते हुए आगे बढ़ती है। इसी क्रम में लगभग सात घंटे बीताते हुए गाड़ी व्यारा पहुंचती है। मैं गंत्व्य पर आ चुका हूं। गाड़ी से उतरकर स्टेशन से बाहर निकलता हूं। यात्रा का दूसरा दिन भी समाप्त होने को है। इसी तरह मेरी रेल यात्रा समाप्त होती है। व्यारा के एक होटल में पहुंचता हूं। और इस शहर का विवरण में अगले पोस्ट में दूंगा।  
व्यारा शहर का एक पार्क                                             




                                                                                                                                            
                                                                                                                                         -  दीपक मिश्रा

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