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गुरुवार, 25 जून 2020

एक जुलाई से चातुमार्स शुरू, जानें क्या है महत्व



1 जुलाई को देवशयनी एकादशी से चातुर्मास शुरू हो रहे हैं। चातुर्मास का अर्थ चार माह होता है मतलब वो चार महीने जब शुभ काम वर्जित होते हैं। देवशयनी एकादशी से देवप्रबोधिनी एकादशी के बीच के समय को चातुर्मास कहते हैं। इस बार अधिक मास के कारण चातुर्मास चार की बजाय पांच महीने का होगा। श्राद्ध पक्ष के बाद आने वाले सारे त्योहार लगभग 20 से 25 दिन देरी से आएंगे।

            जनकारों का कहना है कि इस बार आश्विन माह का अधिकमास है, मतलब दो आश्विन मास होंगे। बताते चलें कि आश्विन महीने में ही श्राद्ध और नवरात्रि, दशहरा जैसे त्योहार होते हैं। आमतौर पर पहले पक्ष को पितृ पक्ष कहते हैं और श्राद्ध खत्म होते ही देवी पक्ष शुरू हो जाता है। नवरात्रि आरंभ हो जाती है लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा। 17 सितंबर 2020 को श्राद्ध खत्म होंगे और अगले दिन से अधिकमास शुरू हो जाएगा जो 16 अक्टूबर तक चलेगा।
17 अक्टूबर से नवरात्रि आरंभ होगी। इस तरह श्राद्ध और नवरात्रि के बीच इस साल एक महीने का समय रहेगा। दशहरा 26 अक्टूबर को और दीपावली 14 नवंबर को मनाई जाएगी। 25 नवंबर को देवउठनी एकादशी रहेगी और इस दिन चातुर्मास खत्म हो जाएंगे।


लीप ईयर और अधिक मास एक ही साल में
         जानकारों  के अनुसार 19 साल पहले 2001 में आश्विन माह का अधिकमास आया था। अंग्रेजी कैलेंडर का लीप ईयर और आश्विन के अधिकमास का योग 160 साल बाद बन रहा है। इससे पहले 1860 में ऐसा अधिकमास आया था।

हर तीन साल में आता है अधिकमास

         बताया जाता है कि 1सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है जबकि एक चंद्र वर्ष 354 दिनों का माना जाता है। दोनों वर्षों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर होता है। ये अंतर हर तीन वर्ष में लगभग एक माह के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को दूर करने के लिए हर तीन साल में एक चंद्र मास अतिरिक्त आता है। जिसे अतिरिक्त होने की वजह से अधिकमास का नाम दिया गया है। अधिकमास के पीछे पूरा वैज्ञानिक दृष्टिकोण है।

चातुर्मास में तप और ध्यान करने का विशेष महत्व
               चातुर्मास में भगवान विष्णु विश्राम करते हैं और सृष्टि का संचालन भगवान शिव करते हैं। देवउठनी एकादशी के बाद विष्णुजी फिर से सृष्टि का भार संभाल लेते हैं।

अधिकमास को मलमास कहा जाता है
            अधिकमास में सभी पवित्र कर्म वर्जित माने गए हैं। इस पूरे माह में सूर्य संक्राति नहीं रहती है। इस वजह से ये माह मलिन हो जाता है। इसलिए इसे मलमास कहते हैं। मलमास में नामकरण, यज्ञोपवित, विवाह, गृहप्रवेश, नई बहुमूल्य वस्तुओं की खरीदी जैसे शुभ कर्म नहीं किए जाते हैं।

अधिकमास को पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं
मान्यता है कि मलिन मास होने की वजह से कोई भी देवता इस मास का स्वामी होना नहीं चाहता था। तब मलमास ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। मलमास की प्रार्थना सुनकर विष्णुजी ने इसे अपना श्रेष्ठ नाम पुरषोत्तम प्रदान किया। श्रीहरि ने मलमास को वरदान दिया कि जो इस माह में भागवत कथा श्रवण, मनन, भगवान शिव का पूजन, धार्मिक अनुष्ठान दान करेगा उसे अक्षय पुण्य प्राप्त होगा।


सनातन धर्म के साथ-साथ जैन धर्म व  बौद्ध धर्म में चातुर्मास का महत्व है
यू ंतो एक जैन संत जगह-जगह भ्रमण करते हुए धर्म का प्रचार प्रसार करते हैं तथा लोगों को धर्म की बाते बताते हैं। पर चातुर्मास में यात्रा करने से बचते हैं क्योंकि ये वर्षा ऋतु का समय रहता है। इस दौरान नदी.-नाले उफान पर होते है तथा कई छोटे.छोटे कीट उत्पन्न होते हैं। इस समय में विहार करने से इन छोटे.-छोटे कीटों को नुकसान होने की संभावना रहती है। इसी वजह से जैन धर्म में चातुर्मास के दौरान जैन  संत एक जगह रुककर तप करते हैं।


बौद्ध धर्म के मान्यताओं के अनुसार गौतम बुद्ध राजगीर के राजा विम्बसार के शाही उद्यान में रहे, उस समय चौमासा की अवधि थी। चार माह मंदिर या मठ में रूककर देश, जन और प्रकृति के उत्थान के लिए पूजन, साधना व उपवास किए जाते हैं। चातुर्मास करने वाले भिक्षुओं के भोजन, पानी की व्यवस्था बौद्ध धर्म के अनुयायी करते हैं। चातुर्मास पूरा होने पर उन्हें वस़्त्र दान देकर विदा करते हैं जिसे चीवरदान उत्सव कहा जाता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से चातुर्मास
 
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी ये चार माह खानपान में अत्यंत सावधानी बरतना आवश्यक होता है। इस समय हवा में नमी काफी बढ़ जाती है। जिसके कारण बैक्टीरिया, कीड़े, जीव-जंतु आदि बड़ी संख्या में पनपते हैं। सब्जियों में जल में बैक्टीरिया पनपने लगते हैं। खासकर पत्तेदार सब्जियों में कीड़े आदि ज्यादा लग जाते हैं। इन चार माह में पत्तेदार सब्जियां आदि खाने की मनाही रहती है।

                                                                                                                     - दीपक मिश्रा, देशदुनियावेब

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