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शुक्रवार, 12 जून 2020

जानें कैसी फिल्म है ‘गुलाबो सिताबो‘


फिल्म - गुलाबो सिताबो
मुख्य कलाकार - अमिताभ बच्चन, आयुष्मान खुराना, विजय राज, प्रकाश वाजपेयी समेत कई अन्य कलाकार
निर्देशक - सुजीत सरकार
जॉनर  - ड्रामा
अवधि - 124 मिनट 50 सेकेंड

लॉकडाउन के दरम्यान हम ‘चाक्डः पैसा बोलता है‘, ‘चिंटू का बर्थडे‘ जैसी फिल्में ओटीटी प्लेटफार्म में देख चुके हैं और इसी क्रम में शुक्रवार यानी 12 जून को अमेजन प्राइम में ‘गुलाबो सिताबो‘ रिलीज हुई। इस बंद-बंद के माहौल में इस फिल्म को एक एवरेज इंटरटेनमेंट डोज कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

                      फिल्म की कहानी लखनउ स्थित फातिमा महल से शुरू होती है और शुरूआत में ही हवेली के मालिक मिर्जा यनी अमिताभ बच्चन को अपने ही किरायेदार के बल्ब को चुराते हुए देखते हैं। बाद में हमारा परिचय बांके से होता है जो अपनी तीन बहनों व मां के साथ हवेली में किराये पर रहता है। मिर्जा अपने किरायेदारों के सामान मसलन बल्ब, घंटी आदि चुराकर बहुत ही कम पैसे में बेच देता है। बांके के अलावा कई अन्य किरायेदार भी हैं जो मिर्जा के व्यवहार से परेशान हैं साथ ही उन्हें बुनियादी सुविधायें भी बमुश्किल उपलब्ध हो पाती हैं। वहीं दूसरी ओर मिर्जा अपने किरायेदारों से खासकर बांके से क्षुब्ध रहता है क्योंकि आज के जमान में भी वह 30 रूप्ये ही किराय देता है वह भी नियमित रूप से नहीं देता। कहानी आगे बढ़ती है और किरायेदार व हवेली मालिक एक-दूसरे छुटकारा पाने का उपक्रम करते हैं और इसी क्रम में एक पुरात्तव विभाग के अधिकारी ज्ञानेश शुक्ला यानी विजय राज व वकील क्रिस्टोफर क्लार्क यानी वृजेंद्र काला प्रवेश होता है। जैसे-जैसे फिल्म आगे बढती है मामला और भी पेचीदा होता चला जाता है। अब किरायेदार जीतते हैं या हवेली मालिक की जीत होती है, क्या वाकई में मिर्जा हवेली का मालिक है, हवेली किस की रह जाती है। बस यही सब सवाल फिल्म के आधार हैं। और ये सब जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी।
        
                 जिस फिल्म में अमिताभ बच्चन व आयुष्मान खुराना जैसे दिग्गज अभिनेता हो उसमें दमदार अभिनय का होना अलाजिमि है। साथ ही साथ विजय राज, प्रकाश वाजपेयी, पूर्णिमा शर्मा आदि की अदाकारी अलग प्रभाव छोड़ती है। सृष्टी श्रीवास्तव ने भी चालू किस्म की लड़की का किरदार जर्बदस्त तरीके से प्रजेंट किया है। यह किरदार गुड्डो का है जो बांके की बहन है।
  
              मिर्जा की टुच्चई करतुतों पर हमें कभी हंसी आती है तो कभी उसके संघर्षों पर दया भी। उस पात्र को समझना बहुत मुश्किल है। पर इसे समझने से बेहतर होगा कि इसके कारनामों का आनंद उठाया जाय। वहीं दूसरी ओर विभिन्न तरह की जिम्मेदारियों से दबा बांके रस्तोगी का पात्र भी हमें प्रभावित करता है। जिम्मेदारियों को निभाने में वह पढ़-लिख नहीं पाता और हम मामले में असफल ही दिखता है।
     फिल्म के संवद लखनवी अंदाज में हैं जो लखनउ के दृश्यों व चल रही कहानी से बांधती है। हम पात्रों से जुड़ जाते हैं खासकर मिर्जा और बांके से। विजय राज कॉमेडी का तड़का लगाते हैं। यहां एक चीज और बेगम का पात्र यानी फारूख जफर का स्क्रीन टाइम बहुत कम है पर जितना है दमदार है।
   गाना, बेकग्राउंड म्यूजिक सब उम्मीदों पर खरा उतरता है।

              शुरूआती समय में ही हम पात्रों को समझ जाते हैं पर बार-बार हमें उनके स्वभाव को बताया जाता है। इसी दोहराव से कभी-कभी हमें यह फिल्म काफी स्लो प्रतीत होती है। फिल्म के क्लाइमेक्स में जिन पात्रों से हम जुडत्रे होते हैं उनके समस्याओं का समाधान होते नहीं देख पाते। हम उन्हें उन्ही के हाल पर छोड़ जाते हैं।
 ‘गुलाबो खूब लड़े सिताबो खूब लडे ...‘ गीत के साथ फिल्म का समापन हो जाता है यह गीत कठपुतली नृत्य दिखाते समय गाया जाता है। हलांकि फिल्म की शुरूआत में भी यही गीत सुनाया जाता है।

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