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गुरुवार, 17 सितंबर 2020

हमें जीनें की कला सिखाती हैं ये नीतियां

Courtsey - Google image
शुक्रनीति, चाणक्यनीति, भर्तृहरिनीति व विदुरनीति आदि कई ऐसे नीतियों के संग्रह हैं जो हमें जीवन जीने की कला सिखाते हैं। इन नीतियों पर अमल कर न केवल हम अपने व्यक्तित्व को प्रभावशाली बना सकते बल्कि अपने सामाजिक दायित्वों को भी सही तरीके से निभा सकते हैं। इस पोस्ट में चुनिंदा नीतियों को शामिल किया है। मूल श्लोक न देकर केवल भावार्थ दे रहा हूँ। आइये जानते हैं इन नीतियों को।

 

  1. अपनी प्रिय स्त्री के कहने मात्र से ही माता, पुत्रवधु, भाई की पत्नी के अपराध को बिना स्वयं अनुभव किये अपराध नहीं समझना चाहिए। - शुक्रनीति

      

  2. आयु, धन, गृह के दोष, मंत्र, मैथुन, औषध, दान, मान तथा अपमान। इन नौ विषयों को अत्यंत गुप्त रखना चाहिये। किसी से भी कहना नहीं चाहिये। - शुक्रनीति

      

  3. मधुर एवम प्रिय वचन बोलने से सभी प्राणी प्रसन्न होते हैं। प्रिय वचनों से पराया भी अपना हो जाता है। अतः मधुर वचन बोलने में कृपणता नहीं करना चाहिये। - चाणक्यनीति 

     

  4. जहां का शासन स्त्री, जुआरी और बालक के हाथ में होता है, वहां के लोग नदी में पत्थर की नाव पर बैठनेवालों की भांति विवश होकर विपत्ति के समुद्र में डूब जाते हैं। - विदुर नीति

     

  5. धैर्य, मनोनिग्रह, इन्द्रियसंयम, पवित्रता, दया, कोमल वाणी और मित्र से द्रोह न करना। ये सात बातें लक्ष्मी बढ़ानेवाली है। - विदुर नीति

      

  6. जो विश्वासपात्र नहीं है, उसपर कभी विश्वास न करें, परन्तु जो विश्वासपात्र है उसपर भी अधिक विश्वास न करें। क्योंकि अधिक विश्वास से भय उतपन्न होता है। अतः बिना समुचित परीक्षण किये किसी पर विश्वास न करें। - कणिक नीति 

     

  7. मूर्खों को दिया गया उपदेश उसी प्रकार उनके क्रोध को बढ़ानेवाला जिस प्रकार सर्पों को दूध पिलाने से उनके विष का ही वर्धन होता है। - पंचतंत्र

     

  8. जो कभी रुष्ट होता है कभी प्रसन्न होता है। इस प्रकार क्षण-क्षण में रुष्ट और प्रसन्न होता रहता है। उस चंचल चित्त पुरुष की प्रसन्नता भी भयंकर ही है। - घटखर्पर नीतिसार

      

  9. दूसरे के अन्न खाने से जिसकी जीभ जल चुकी है, दूसरे से दान लेने से जिसके हाथ जल चुके हैं और दूसरे की स्त्री का चिंतन करने से जिसका मन जल चुका है उसे(जप, तप, आदि करने से) सिद्धि कैसे मिल सकती है। - कुलार्णव तंत्र 

     

  10. प्रायः दुरात्मा पुरुषों की संपतियां भी अंततः दुःखदायिनी ही होती है। महापुरुषों की विपत्तियां भी अंत में सुखरूपता में परिणत हो जाती है। - प्रसन्नराघव 

 

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