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शनिवार, 9 जनवरी 2021

फिल्म समीक्षा: महज एक ‘कागज‘ से सिस्टम पर प्रहार

कलाकार - पंकज त्रिपाठी, मोनल गज्जर, मीता वशिष्ठ, सतीश कौशिक, अमर उपाध्याय आदि। निर्देषक - सतीश कौशिक निर्माता - सलमान खान, निशांत कौशिक व विकास मालू। रेटिंग - चार स्टार पांच में से अवधि - 1 घंटा 49 मिनट ‘कागज‘ फिल्म सात जनवरी को ही जीफाइव में रिलीज हो गयी थी पर मैनें इस फिल्म को देर से देखा इसलिये रिव्यू भी देर से अपलोड कर रहा हूं। अगर आप आगे पढ़ना नहीं चाहते या आपके पास समय की किल्लत है तो आपको सब बात की एक बात बता दूं और वह यह कि मैनें इस वर्ष की शुरूआत एक अच्छी फिल्म देखकर की है। और आप भी अगर फिल्म देखना चाह रहें हैं तो इसे देख ही डालें। अब आइये करते हैं फिल्म की समीक्षा। कहने को तो एक प्रमाण पत्र महज कागज का टूकड़ा होता है पर यही कागज का टूकड़ा किसी के अस्तित्व का आधार भी बन जाता है। एक ऐसी विडंबना कि सामने खड़ी हाड़ मांस की संरचना को छोड़ कर एक बेजान कागज के टूकड़े पर विश्वास किया जाता है। और यही मूल विषय है सात जनवरी को जीप्रिमियम में रिलीज हुई बाॅलीवुड फिल्म ‘कागज‘ की। सलमान खान द्वारा निर्मित और सतीश कौशिक निर्देशित यह फिल्म सिस्टम पर करारा प्रहार करती है। इस फिल्म की कहानी कुछ इस प्रकार है। आजमगढ़ जिले के अमीलो गांव में भरत लाल की बैंड-बाजे की दुकान है। पंडित की सलाह और पत्नी की जिद पर वो दुकान को बेहतर और बड़ा करने के लिए कर्ज लेने को बैंक जाता है। और लोन लेने के लिए वह अपनी पुश्तैनी जमीन जो कि दूसरे गांव में स्थित है को गिरवी रखने की सोचता है। जमीन की पूरी जानकारी के लिए जब वह तहसील कार्यालय पहुंचता है तब उसे एक बड़ा झटका लगता है। उसे पता चलता है कि एक दशक पहले ही उसी की मृत्यु हो चुकी है। चाचा के परिवार वालो ने तहसील कार्यालय के लेखपाल से सांठगठ कर उसे कागजों में ही मरवा दिया था ताकि उस जमीन का और कोई दूसरा उत्तराधिकार न रह जाये। कहानी मोड़ लेती है और अब भरत लोन की बात भूलकर खुद को जिंदा करने के जद्वोजहद में जुट जाता है। एक छोटे पदाधिकारी से लेकर पीएम तक को चिट्ठी लिखता है पर बात वहीं ढाक के तीन पात। ऐसा लगने लगता है कि इस सिस्टम में सबसे ज्यादा पावरफुल कोई और है तो वह है लेखपाल। अपने आपको जिंदा साबित करने में एक लंबा दौर गुजर जाता है, सबकुछ चैपट हो जाता है और उसकी जिंदगी नरक हो जाती है बावजूद वह अपनी लड़ाई जारी रखता है। फिर वह अपने जैसे ही सिस्टम के शिकार व्यक्ति का संघ बनाकर आरपार की लड़ाई करता है और इसमें उसका साथ देता है लोकतंत्र का चैथा स्तंभ जिसे हम मिडिया कहते हैं। कहानी इस तरह बुनी गयी है कि दर्शकों को बांध लेती है। फिल्म की पटकथा और संवाद काफी प्रभावी है। सबसे बड़ी बात यह कि फिल्म में एक- एक चीज को बड़ी बारीकी से ध्यान दिया गया है। अभिनय की बात करें तो कहानी का नायक भरत लाल की भूमिका पंकज त्रिपाठी ने निभाई है। उन्होंने यह लड़ाई इतनी शिद्वत से लड़ी है कि एक दर्शक उस लड़ाई में खो जाता है। वहीं भरत की पत्नी की रोल में मोनल गज्जर हमें प्रभावित करती हैं। हरेक का अभिनय उम्दा है बात चाहें साधुराम केवट एडवोकेट के रोल में सतीश कौशिक हो या फिर विधायक के रूप में अमर उपाध्याय। यह फिल्म हमें कभी गुदगुदाती है तो कभी रूलाती है। एक समय हम मुख्य पात्र से पूरी तरह जुड़ जाते हैं तथा भावुक हो जाते हैं। यह फिल्म बताती है कि यह सिस्टम एक सीधे-साधे व्यक्ति का मजाक बना सकती है। कुल मिलाकर यह फिल्म देखने लायक है। दीपक मिश्रा, देशदुनियावेब

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