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गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

11 मार्च को है महाशिवरात्रि, ऐसे करें शिवरात्रि व्रत

 

11 मार्च को है महाशिवरात्रि

 महाशिवरात्रि का व्रत आगामी 11 मार्च को है। शिवभक्तों का लिए पूरे वर्ष का यह सबसे पवित्र व पुनीत दिन होगा। देश के विभिन्न ज्योर्तिलिंगों समेत अन्य शिवालयों में विशेष पूजन का आयोजन होगा। यह निराकार के साकार ‘लिंग‘ रूप में प्राकट्य का पर्व है। इस दिन भक्तगण महाशिवरात्रि का व्रत रखेंगे वहीं इस व्रत का पारण 12 मार्च अर्थात शुक्रवार को होगा।  

महाशिवरात्रि का महत्व


पुराणों के अनुसार महाशिवरात्रि का दिन काफी महत्पवूर्ण है। यह पर्व ंिहंदी पंचांग के अनुसार फाल्गुण कृष्णपक्ष त्रयोदशी/चतुर्दशी को मनाया जाता है। पुराणों के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन ही भगवान शिव व माता पार्वती का विवाह हुआ था। इस शिवोपासना व शिवपूजन का विशेष महत्व है। यह पूजन काफी कल्याणकारी व मंगलप्रद होता है।

कैसे करें महाशिवरात्रि का व्रत

आमतौर पर व्रत से एक दिन पूर्व से ही भक्तगण संयम में रहते हैं। स्नान करने के बाद ही अन्न ग्रहण करते है। शुद्ध व सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं, घर में ही बना भोजन ग्रहण करते हैं। शिवरात्रि के अवसर पूरा दिन उपवास करते हैं। शिवालय में या फिर शिवालय न जा पाने की स्थिति में घर में ही पूजन करते हैं तथा शाम में फलाहार ग्रहण करते हैं। वहीं शिवमहापुराण में भी महाशिवरात्रि व्रत की विधि बतायी गयी है। इस विधि के अनुसार भक्त को चाहिए कि प्रातःकाल उठकर आलस्य रहित हो स्नानादि नित्यकर्म करें। उसके बाद शिवालय जाकर यथाविधि पूजन करते हुए शिवरात्रि व्रत करने का संकल्प लेना चाहिए। रात्रि को भी शास्त्रसम्मत शिवलिंग की पूजा उत्तम विधि से संपादित करें। जिस मंत्र का जो द्रव्य हो उसी द्रव्य के द्वारा पूजन करना चाहिए, बिना मंत्र के भगवान शिव की पूजा नहीं करनी चाहिए। भक्तिभाव से युक्त गीत, वाद्य आदि के साथ प्रथम प्रहर की पूजा के बाद मंत्र जाप भी कर सकते हैं। रात्रि के चारो प्रहर पूरी भक्ति व आस्था से भगवान शिव की पूजा करें। रात्रि में प्रेम से महोत्सवपूर्वक जागरण करें। पुनः प्रातःकाल स्नानोपरांत पूजा करें। व्रत समाप्त करके भगवान के समक्ष हाथ जोड़कर प्रार्थना करें। आप चाहें तो यह भी बोल सकते हैं -
           हे महादेव! आपकी आज्ञा से मैनें जो व्रत ग्रहण किया था, वह उत्तम व्रत संपूर्ण हो गया। अब मैं व्रत का विसर्जन करता हूं। हे देवेश! मेरे द्वारा यथाशक्ति किए गए इस व्रत से आप संतुष्ट हों और मेरे उपर दया करें।
इसके बाद भगवान शिव को पुष्पांजली समर्पितकर यथाविधि दान देते हुए ब्राह्मणों को व सन्यासियों को शक्ति के अनुसार भोजन कराकर उन्हें भलिभांति संतुष्ट करते हुए स्वयं भोजन करें।

महाशिवरात्रि से संबंधित एक कथा  (व्याध - मृग कथा)


शिवमहापुराण में एक कथा का वर्णन है। इस कथा से हम महाशिवरात्रि के महत्व को समझ सकते हैं। जब अज्ञानतावश या यूं कहें संयोग से एक शिकारी द्वारा महाशिवरात्रि के अवसर पर शिव पूजा हो जाने से उसका जीवन सफल हो सकता है तो पूरी श्रद्घा व भक्ति से किया गया शिवरात्रि का फल कितना फलदायी होगा इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। आइये जानते हैं उस व्याध की कथा।
 

किसी जंगल में एक समय गुरूद्रह नामक एक व्याध रहता था। वह काफी क्रूर व निर्दयी था तथा प्रतिदिन निर्दोश पशुओं का वध करता था। यही नहीं पशुओं की हत्या के साथ-साथ चोरी भी कर लेता था ताकि अपने परिवार का पालन पोषण कर सके। उसने कभी भी शुभ व धार्मिक कार्य नहीं किया। एक दिन उसे कोई शिकार नहीं मिला और उसके परिवार के सभी सदस्य भूख से बिलबिला रहे थे। वह शिकार खोजने के उद्देश्य से वन में निकल पड़ा। वह दिन महाशिवरात्रि का था पर उस अज्ञानी को इस बात का ज्ञान नहीं था। दैवयोग से उसके हाथ कोई शिकार नहीं आया। सूर्यास्त हो चला था पर वह यूं ही धनुष लेकर वन में भटकता फिर रहा था। उसने सोचा कि अगर वह खाली हाथ जायेगा तो अपनी पत्नी व परिवार के अन्य सदस्यों को क्या जवाब देगा।
     


  उसने शिकार कर के ही घर वापस जाने का निश्चय किया। फिर वह एक जलाशय के समीप जाकर एक बिल्ववृक्ष में चढकर छूप गया और किसी पशु के आने का इंतजार करने लगा। रात का प्रथम प्रहर बीत रहा था तभी प्यास से व्याकुल एक हिरणी वहां आ पहुंची। हिरणी को देखते ही उसे मारने के लिए शिकारी ने जैसे ही अपने धनुष पर बाण चढ़ाया, उसके इस हरकत से जल तथा कुछ बिल्वपत्र जड़ के पास रखे एक शिवलिंग पर गिर पड़ा। इस प्रकार प्रथम प्रहर की पूजा-व्याध से संपन्न हो गयी।   
     इधर हिरणी की नजर जब उस व्याध पर पड़ी तो उसने कहा कि अगर मेरे इस अनर्थकारी देह से तुम्हें व तुम्हारे परिवार का भला होता है तो बेशक मुझे मार देना पर इस वक्त मुझे जाने दो। मेरे सभी बच्चे मेरे इंतजार में हैं मुझे उन्हें मेरे स्वामी और बहन को सौंप कर आने दो। इतना सब बोलने के बावजूद वह व्याध उसे मारने पर अड़ा था। अंत में उस मृगी ने शपथ लेते हुए कहा कि यदि मैं जा करके न लौटूं तो वेदविक्रयी, त्रिकाल संध्योपासनहीन ब्राह्मण को तथा अपने स्वमाी की आज्ञा का उल्लंघन करके कर्म में तत्पर रहने वाली स्त्रियों को जो पाप लगता है, शिवविमुख को जो पाप लगता है, परद्रोही को जो पाप लगता है, विश्वासघाती एवं छल करने वाले को जो पाप लगता है वह सब पाप मुझे लगे, यदि मैं तुम्हारे पास न लौटूं।
      यह वचन सुनकर उस भील ने उस पर विश्वास करते हुए कहा - ‘घर जाओ‘। इस तरह उस व्याध का प्रथम प्रहर बिना निद्रा के ही बीत गया। इसी बीच एक हिरणी आयी जो पहली हिरणी की बहन थी और वह उत्कंठापुर्वक अपनी बहन को खोजने आयी थी। उसे देखकर उस भील ने अपने बाण को निशाना साधते हुए खींचा। बाण खींचते ही पहले के समान ही जल तथा बिल्वपत्र शिवलिंग पर गिर पड़े। संयोगवश भगवान शिव की दूसरे प्रहार की भी पूजा हो गयी।
 उस व्याध को देखते ही प्रयोजन भांपते हुए कहा कि आज मेरा देह धारण करना सफल हुआ क्योंकि इस शरीर से किसी का उपकार होगा। परंतु मेरे बच्चे घर पर हैं उन्हें मैं अपने स्वामी को सौंपकर पुनः यहां आ जाउंगी।
व्याध ने दृढ़ता से कहा - मैं तुम्हारी बात नहीं मानता, तुम्हें अवष्य मारूंगा इसमें संशय नहीं है।
इस मृगी ने भगवान बिष्णु का शपथ लेते हुए कहा - हे ब्याध! मैं जो कहती हूं उसे सुनो यदि मैं पुनः न आउं तो अपनी बात से विचलित होने वाले का जिस प्रकार सुकृत नष्ट हो जाता है अथवा जो मनुष्य अपनी विवाहिता स्त्री को छोड़कर दूसरी स्त्री से समागम करता है, जो वेदधर्म कर उल्लंघन कर मनमाने मार्ग से चलता है, बिष्णुभक्त होकर जो शिव की निंदा करता है, ऐसे लोगों को जो पाप लगता है वह मुझे लगे।
ये सब बातें सुनकर उस व्याध ने उस हिरणी को भी घर जाने की अनुमति दे दी। तबतक उस व्याध का दूसरा प्रहर भी बिना निद्रा के ही बीत गया।   

तीसरा प्रहर आने पर उसे एक मृग जलाशय की ओर आता दिखाई पड़ा। उस पुष्ट मृग को देखकर वह शिकारी बहुत ही प्रसन्न हुआ और धनुष पर बाण चढ़ाकर उसे मारने के लिए उद्यत हो गया। और एक बार फिर कुछ बिल्वपत्र शिवजी के उपर गिर पडे़। इस प्रकार उस रात्रि उस भील से तीसरे प्रहर की भी शिवपूजा हो गयी।
जैसे ही मृग ने यह समझा कि वह शिकारी अपने कुटुम्ब के लिए उसका शिकार करेगा तो वह प्रसन्नचित्त हो गया और बड़ी शीघ्रता से उसने व्याध से कहा - मैं धन्य हूं जो इतना पुष्ट हूं जिससे तुम्हारी तृप्ती हो जायेगी। जिसका शरीर उपकार के लिए प्रयुक्त न हो उसका सबकुछ निश्फल हो जाता है। किंतु मैं अपने बच्चों को उनकी माता को सौंपकर आता हूं और उन सभी को धैर्य देकर पुनः आ जाउंगा।
मृग के ऐसा कहने पर शिकारी बहुत ही विस्मित हुआ। हलांकि अब तक उसका मन थोड़ा शुद्व हो चुका था सो उसने कहा - जो-जो यहां आये, वे सभी तुम्हारे जैसा ही कहकर चले गये, किंतु वे वंचक अभीतक नहीं लौटे। हे मृग! तुम्हारा प्राण संकट में हैं इसलिए तुम झूठ बोलकर जाना चाहते हो।
मृग ने जवाब दिया - हे व्याध ! मैं जो कहता हूं उसे सुनो। यह सारा चराचर ब्रह्माण्ड सत्य से ही प्रतिश्ठित है। जिसकी वाणी मिथ्या होती है उसका पुण्य क्षणभर में ही नष्ट हो जाता है। तथापि हे भील! तुम मेरी सत्य प्रतिज्ञा को सुनों। संध्याकाल में मैथून करने से, शिवरात्रि को भोजन करने से, झूठी गवाही देने से, धरोहर का हरण करने से, समर्थ रहते उपकार न करने से, शिवपर्व के दिन बेल के तोड़ने से, अभक्ष्य-भक्षण करने से, ये सब करने से जो पाप लगता है वह पाप मुझे लगे यदि मैं लौटकर वापस न आउं।
मृग का वचन सुनकर उस व्याध ने उससे कहा - जाओ, शीध्र लौटकर आना। तब वह हिरण जल पीकर चला गया।
इधर वन में प्रतिज्ञा किए हुए वे मृग व मृगी परस्पर मिले। इस प्रकार सारा वृतान्त सुनकर सभी ने सत्यपाश में नियंत्रित होने के कारण विचार किया कि हमें वहां निश्चित रूप से जाना चाहिये तब अपने बालकों को धीरज देकर वे जाने को तैयार हो गये। जब सभी बड़े जाने लगे तो बच्चों ने भी यह सोचकर उनके पीछे-पीछे चल पडे़ कि इनकी जो गति होगी, वही गति हमारी भी हो।
      उन्हें आता देख व्याध अत्यंत हर्षित हो उठा और धनुष पर बाण चढ़ाने लगा। इतने में शिवजी के उपर पुनः जल व बिल्वपत्र गिर पड़े। इस तरह चतुर्थ प्रहर की भी उत्तम पूजा संपन्न हो गयी फिर तो क्षणभर में ही उसका सारा पाप नष्ट हो गया। ठीक उसी समय दोनों मृगियों व मृग ने कहा कि - हे व्याधश्रेष्ठ! अब तुम कृपा करो और हमारे शरीर को सार्थक करो।
शिवजी की पूजा के प्रभाव से व्याध को दुर्लभ ज्ञान प्राप्त हो गया और वह सोचने लगा कि ज्ञानरहित ये मृग धन्य हैं, ये परम सम्माननीय हैं जो अपने शरीर से परोपकार में तत्पर हैं। मैनें मनुष्य जन्म पाकर भी क्या फल प्राप्त किया। मैनें दूसरे के शरीर को पीड़ित करके अपने शरीर का पालन किया। मैने तो जन्म से ही पाप किया है, मेरे जीवन को धिक्कार है।
    इस प्रकार से विलाप करने पर भगवान शिव ने प्रसन्न होकर अपने लोकपूजित उत्तमस्वरूप को उसे दिखाया। व्याध ने शिवजी के स्वरूप को देखकर क्षणमात्र में मुक्त हो गया। शिवजी ने भी प्रसन्नचित्त होकर उसे ‘गुह‘ नाम देते हुए दिव्य वर दिए।
शिवजी ने कहा - हे व्याध! तुम श्रृंगवेरपुर में राजधानी बनाकर यथेष्ट दिव्य सुखों का उपभोग करो। वहां तुम्हारे वंश की वृद्धि होगी। तुम देवताओं के लिए भी प्रशंसनीय रहोगे, तुम्हारे घर साक्षात श्री रामचंद्र जी अवश्य पधारेंगे।
इसी बीच मृग भी शिवजी का दर्शन कर मृगयोनि से मुक्त हो गये। तभी से वह शिवलिंग अर्बुदाचल पर्वत पर व्याधेश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए जो दर्शन तथा पूजन से शीध्र मोक्ष एवं भोग प्रदान करने वाले हैं।


                                                                                                                  - दीपक मिश्रा, देशदुनियावेब

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