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बुधवार, 10 मार्च 2021

जानिये, आखिर कैसी थी भगवान शिव की बारात

शिवरात्रि पर निकली झांकी (फाइल फोटो)

जैसे-जैसे शिवरात्रि  नजदीक आती जा रही है भक्तों के मन में उत्साह व उल्लास भी बढ़ता जा रहा है। विभिन्न जगहों पर महाशिवरात्रि को लेकर होने वाले कार्येक्रमों की तैयारी अंतिम चरण में है। कोविड के नियमों के कारण हर वर्ष की तरह शायद ही शिवबारात निकल पाये। अगर कहीं निकलती भी है तो कई तरह की पाबंदियां या फिर नियमों का पालन करना होगा। शिवबारात देखना एक मनमोहक व सुंखद अनुभव होता है। और यही वजह है कि इन झांकियों को देख मन में विचार आ ही जाता है कि वास्तव में शिव बारात कैसी होगी। क्या बारात में ऐसे ही भूत प्रेत शामिल रहे होंगे। रामचरितमानस में हमें शिव बारात का प्रमाणिक वर्णन मिलता है। तो आइये जानते हैं कि आखिर कैसी थी बारात। तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस में शिव बारात का अद्भुत वर्णन किया गया है।
 

एक बार सती जी के पिता राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया। इस आयोजन में सभी देवता, किन्नर, नाग, सिद्ध, गंधर्व आदि को आमंत्रित किया पर सतीजी के पति भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया। लेकिन सभी को आकाश मार्ग से अपने पिता के यज्ञस्थल की ओर जाते देख सतीजी खुद को रोक न सकी और भगवान शिव की आज्ञा के बिना ही वह अपने पिता के यहां चली गयी। चूंकि उन्हें वहां आमंत्रित नहीं किया गया था परिणामस्वरूप उन्हें वहां सम्मान नहीं मिला। उनसे यह अपमान सहा नहीं गया और उन्होंने यज्ञाग्नि में कूद कर अपने शरीर को भस्म कर दिया।
  सती का अगला जन्म हिमाचल के घर पार्वती के रूप में हुआ। पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तप किया। उनकी तपस्या रंग लायी, शिवजी प्रकट हुए और पार्वती के मनोकामना पूर्ण होने का वरदान दे दिया। 

शिवरात्रि पर निकली झांकी (फाइल फोटो)

भगवान शिव और पार्वती के बीच विवाह तय हो जाता है। शिव जी की बारात हिमाचल के घर की ओर रवाना होती है लेकिन यह बारात अद्भूत होती है। तुलसीदास जी रामचरितमानस में कहते हैं।


                               ससि ललाट सुंदर सिर गंगा। नयन तीनि उपबीत भुजंगा।।

                               गरल कंठ उर नर सिर माला। असिव वेष सिवधाम कृपाला।।

सुंदर से मस्तक पर चंद्रमा तथा सिर पर गंगा शोभायमान है वहीं उनके तीन नेत्र हैं, संापों का जनेउ है, गले में विष और छातीपर नरमंुडों  की माला है। यद्यपि उनका वेष पूरी तरह असिव अर्थात अशुभ है बावजूद वे कृपालु व कल्याण के धाम हैं।
यह तो भगवान शिव का वर्णन है जो वर के रूप में हैं और पार्वती से विवाह करने को जा रहे हैं। लेकिन जो बारात में शामिल हैं वो भी एक से बढ़कर एक हैं। देव, गंधर्व तो शामिल ही हैं इनके अलावा भूत-प्रेत भी शामिल हैं जो नाच और गा रहे हैं। और सभी बड़े मौज और मस्ती में हैं। ये सभी देखने में बेढंगे तो हैं ही ये बोलते भी काफी विचित्र ढंग से है। तुलसीदास ने एक छंद से बारात में शामिल लोगों का जीवंत चित्र प्रस्तुत किया है। आइये देखते हैं यह छंद -

                               तन खीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें।

                               भूषण कराल कपाल कर सब सद्य सोनित तन भरें।।

                               खर स्वान सुअर सृकाल मुख गन बेष अगनित को गनै।

                                बहु जिनस प्रेत पिसाच जोगी जमात बरनत नहीं बनै।।

यानी बारात में शामिल हर कोई अलग रूप रंग के हैं। कोई दूबला, कोई बहुत मोटा, कोई पवित्र तो कोई अपवित्र वेश धारण किए हुए हैं। भयंकर गहने पहने हाथ में कपाल लिए हुए हैं और सब के सब शरीर में ताजा खून लपेटे हुए हैं। गधे, कुत्ते, सूअर और सियार के जैसे उनके मुख हैं। गणों के अनगिनत वेषों को कौन गिने। बहुत प्रकार के प्रेत, पिशाच और योगिनियों की जमाते हैं। उनका वर्णन करते नहीं बनता।
 

बारात आगे बढ़ती है और नगर के समीप पहुंच जाती है। बारात को नगर के निकट आया सुन नगर में हलचल मच जाती है। लोग खुद को तैयार कर विभिन्न प्रकार की सवारियों को सजाकर बारात को आदरसहित लेने जाते हैं। लेकिन ये क्या, वर और बारात में शामिल शिवजी के दल को देख सभी वाहन जैसे हाथी, घोड़े आदि डरकर भागने लगते हैं। बड़ी उम्र के समझदार लोग ही रूक पाते हैं, लड़के तो डर से अपने प्राण लेकर भागते हैं।
नगर में तरह तरह की चर्चायें होने लगती है। कोई कहता है कि यह बारात है या फिर यमराज की सेना? दूल्हा पागल है, जो बैलपर सवार है। और संाप, कपाल और राख ही उसके गहने हैं।
अन्य महिलायें व पार्वतीजी की माता मैना भी वर को अर्थात शिव को देखती हैं तो उन्हें काफी दुःख होता है। उनके इस दुःख को इस छंद में आसानी से समझा जा सकता है।

                              कस कीन्ह बरू बौराह बिधि जेहिं तुम्हहि सुंदरता दई।

                              जो फल चहिअ सुरतरूहिं सो बरबस बबूरहिं लागई।।

                             तुम्ह सहित गिरि तें गिरौं पावक जरौं जलनिधि महुं परौं।

                              घरू जाउ अपजसु होउ जग जीवत बिबाहु न हौं करौं।।

पार्वती जी की माता मैना को लगता है कि जिस विधाता ने तुमको सुंदरता दी, उसने तुम्हारे लिए बावला वर कैसे बनाया? जो फल कल्पवृक्ष में लगना चाहिए वह जबर्दस्ती बबूल में लग रहा है। मैं तुम्हें लेकर पहाड़ से गिर पडूंगी, आग में जल जाउंगी या समुद्र में कूद पडूंगी। चाहे घर उजड़ जाये या फिर संसारभर में अपकिर्ति फैल जाये पर जीते जी इस बावले वर से तुम्हारा विवाह नहीं करूंगी। 

         



  बाद में नारद जी मैना को पूर्व जन्म की कथा सुनाते हैं और उन्हें समझाते हैं। उन्हें भगवान शिव के बारे में विस्तार से बताते हैं यही नहीं पार्वती जी के बारे में भी बताते हैं। कहते हैं कि पार्वती जी साक्षात जगज्जननी भवानी है। ये अजन्मा, अनादि और अविनाशिनि शक्ति है तथा सदा शिवजी के अद्र्धांग में रहती हैं।
सच्चाई जानने के बाद मैना और हिमवान आनंद में मग्न हो गये साथ ही साथ नगर के स्त्री, पुरूष, बालक सभी बहुत प्रसन्न हुए। मंगल गीत गाये जाने लगे और विवाह प्रारंभ हो गया।
 

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                                                                                                                     -  दीपक मिश्रा, देशदुनियावेब

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