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गुरुवार, 18 मार्च 2021

आइये जानें शिवमहापुराण की कुछ अनमोल बातें

 

हमारे धर्मशास्त्रों में हमें जीवन जीने का तरीका बताया गया है। बात चाहे रामायण की हो या फिर महाभारत की सभी धर्म, नैतिकता मानवीय मूल्यों का पाठ पढ़ाते हैं। जीवन जीना एक कला है और इस ढंग से जीया जाय तो यह व्यर्थ ही चला जायेगा तथा परिणाम शुन्य होगा। आज हम आपके सामने शिवमहापुराण से दस ऐसी ही अनमोल बातें ला रहे हैं जिस पर अमल करके अपने घर जीवन को सुखद बना सकता है। आइये जानते हैं दस बातें जो किसी भी व्यक्ति को जीवन जीने में, आसपास के माहौल को समझने में, आसपास के लोगों को परखने में तथा अपने जीवन में सकारात्मकता लाने का नया नजरिया देगी।

 

उपकारो ही साधूनां सुखाय किल संमतः।

उपकारो ही ह्ासाधूनामपकरास केवलम्।।

सज्जन व्यक्तियों के साथ किया गया उपकार सुख को बढ़ानेवाला होता है। किंतु वही उपकार यदि दुष्ट व्यक्ति के साथ किया जाय तो वह हानिकारक होता है।

 

गुणोपि दोषतां याति वक्रीभूते विधातरि।

विधाता के विपरित होने पर गुण भी दोष हो जाता है।

 

यस्म्निदृष्टे प्रसीदेत्स्वं मनः हितकृद् ध्रुवम्।

यस्मिनदृष्टे तदेव स्यादाकुलं शत्रुरेव सः।।

आचार्यः कुलमाख्याति वपुराख्याति भोजनम्।

वचनं श्रुतमाख्याति स्नेहमाख्याति लोचनम्।।

आकारेण तथा गत्या  चेष्टया भाशितैरपि।

नेत्रवक्त्रविकाराभ्यां ज्ञायतेऽन्तर्हितं मनः।।

 

जिसके देखने से अपना मन प्रसन्न हो, वह निश्चय ही हितैषी होता है और जिसके देखने से मन में व्याकुलता उत्पन्न हो वह अवश्य ही शत्रु होता है। सदाचार से कुल का, शरीर से भोजन का, वचन के द्वारा शास्त्र ज्ञान का तथा नेत्र के द्वारा स्नेह का पता चल जाता है। आकार, गति, चेष्टा, सम्भाषण एवं नेत्र तथा मुख के विकार से मनुष्य के अन्तःकरण की बात ज्ञात हो जाती है।

 

हसता क्रियते कर्म रूदता परिभुज्यते।

दुःखदाता कोऽप्यस्ति सुखदाता कश्चन।।

सुखदुःखे परो दत्त इत्येशा कुमतिर्मता।

अहं चापि करोम्यत्र मिथ्याज्ञानं तदुच्यते।।

प्राणी हंसते हुए तो कर्म करता है और रोते हुए उसका फल भोगता है। कोई किसी को सुख देने वाला है और ही दुःख देने वाला है। कोई दूसरा सुख और दुःख देने वाला है - यह दुर्बुद्धि मानी गयी है।मैं ही करता हूंयह मिथ्या ज्ञान कहा जाता है।

 

शुभं लब्घवा हृष्येत कुप्पयेलब्घवाशुभं हि।

द्वन्द्वेशु समता यस्य ज्ञानवानच्युते हि सः।।

शुभ वस्तु को प्राप्त कर जो हर्षित नहीं होता और अशुभ को प्राप्त कर क्रोध नहीं करता और द्वन्दो में समान रहता है] वह ज्ञानवान कहा जाता है।

 

आत्मार्थे परार्थे पुत्रार्थे वापि मानवाः।

अनृतं ये भाशन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः।।

जो लोग स्वयं के लिए अथवा दूसरे के लिए यहां तक कि अपने पुत्र के लिए भी झूठ नहीं बोलते वे स्वर्गगामी होते हैं।

वृक्षस्य मूलसेकेन शाखाः पुष्यन्ति वै यथा।

शिवस्य पूजया तद्वत्पुष्यत्यस्य वपुर्जगत्।।

सर्वाभयप्रदानं सर्वानुग्रहणं तथा।

सर्वोपकारकरणं शिवास्यारधनं विदुः।।

यथेह पुत्रपौत्रादैः प्रीत्या प्रीतो भवेत्पिता।

तथा सर्वस्य संप्रीत्या प्रीतो भवति शंकरः।।

 

जैसे वृक्ष की जड़ को सींचनें से शाखायें पुष्ट होती है। वैसे ही शिव की आराधना को सभी प्रकार का अभय प्रदान करने वाला, सब प्रकार से अनुग्रह करने वाला तथा सभी का उपकार करने वाला बताया गया है। जैसे इस लोक में पुत्र-पौत्र की प्रसन्नता से पिता प्रसन्न होता है वैसे ही सभी की प्रसन्नता से शंकर जी प्रसन्न होते हैं।

 

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