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मंगलवार, 9 मार्च 2021

अपने श्रृंगार से लोगों को मंत्रमुग्ध कर रही है प्रकृति

 

जंगली पुष्प
जंगली पुष्प
DDW, DESK -  झारखंड एक ऐसा प्रदेश जो जंगलों, पर्वतों, नदियों व तीर्थस्थलों की भूमि है। यूं कोई भी, कभी भी यहां आकर पकृति रचित नयनाभिराम दृश्यों का रसपान अपने नयनों से कर सकता है। पर वसंत के दौरान पकृति की अनुपम छटा किसी को मंत्रमुग्ध कर रहा है। 

कोयल की कूक और प्रकृति की श्रृंगार से मोहित हो रहे लोग

 कोयल की कूक से गूंजता वन, किसी वृक्ष के पुराने पत्ते झड़ रहे हैं तो कोई पेड़ नवपल्लव से हराभरा हो चुका है मानों उसमें एक नयी जान आ गयी हो और मंद-मंद बह रही हवा से झूम रहा है। एक वन में दर्जनों वृक्ष और सभी का अलग-अलग रूप। और समवेत रूप से सभी रचते हैं एक मनमोहक व अद्भुत दृश्य। उपर से बहती हवा के साथ आती जंगली फूलों, नवपल्लवों व आम्रमंजर की भीनी-भीनी खुशबू मन को और भी आनंदित कर देती है।

वृक्षों में आये नवपल्लव

वसंत में बदल गयी है पारसनाथ पर्वत व जंगलों की तस्वीर

          पारसनाथ पर्वत को झारखंड के सर्वोच्च पर्वत होने का गौरव प्राप्त है। साथ ही साथ जैन धर्मावलंबियों का प्रसिद्ध तीर्थस्थल भी है। इन दिनों यहां आनेवाले लोगों का साक्षात्कार सज-धज कर तैयार प्रकृति से होता है। मनमोहक नजारों को देखकर कोई भी इस आनंद को महज दो पल में ही देखकर छोड़ देना नहीं चाहता। ऐसे में ज्यादातर लोग अपने मोबाइल व कैमरे में इन दृश्यों को कैद कर लेते हैं। हलांकि कुछ ऐसे प्रकृतिप्रेमी भी हैं जो अपने नयनों के जरिये इन नयनाभिराम दृश्यों को अपने हृदय में हमेशा के लिए समेट लेना चाहते हैं। वाकई में ये दृश्य किसी व्यक्ति के हृदय में अमिट छाप छोड़ देते हैं। इन दृश्यों को देखकर कोई भी कुछ क्षण के लिए ठिठक जायेगा। 

                                  

आम का मंजर
आम का मंजर


जैसे ही आप इस पर्वत की यात्रा शुरू कर देते है। सड़क के दोनों और झूमते हुए वृक्ष मिलेंगे। अभी न तो ठंढ़ है और न ही गर्मी। हां, अगर आप दस बजे पर्वत की चढ़ाई करने लगेंगे तो इस मौसम में चढ़ाई करना थोड़ा दुष्कर होगा। यही वजह है कि जिन्हें पूजोपासना के लिए पर्वत चढ़ना होता है वे सुबह चार-पांच बजे ही पर्वत यात्रा शुरू कर देते हैं। भक्तगण को 27 किलोमीटर की दूरी पैदल ही चलनी पड़ती है। हलांकि इस पोस्ट में मैं केवल यहां का खुशनूमा वातावरण का विवरण दे रहा हूं। मार्ग आदि के बारे में जाने के लिए आप निम्न लिंकों में क्लिक कर के पढ़ सकते हैं।

प्राकृतिक छटा व शांति से मिलता है अद्भुत सुकून

सुबह चार बजे ही दूर कहीं जंगल से कोयल की कूक सुनाई देगी। और इस कर्णप्रिय आवाज का सिलसिला सुबह नो सै दस बजे तक निरंतर सुनने को मिलता रहेगा। कभी दूर से आवाज आयेगी तो कभी लगेगा जैसे समीप के वृक्ष पर ही कोयल कूक रही है। महज आवाज से ही आपके पहली बार यहां आये व्यक्ति के मन में वन का एक सुंदर सा कल्पित दृश्य उभरने लगता है। तीर्थयात्रा के लिए यहां पहुंचे व्यक्ति के लिए तो एक पंथ दो काज हो जाता है। वहीं केवल प्रकृति की सुंदरता का दीदार करने पहुंचे प्रकृतिप्रेमी जी भर कर प्राकृतिक छटा का लुत्फ उठाते हुए अपना समय व्यतीत करते हैं या यूं कहें सदुपयोग करते हैं। मनोरम प्राकृतिक छटा, खुशनुमा माहौल व अद्भुत शांति किसी भी थके हारे व्यक्ति में एक नई उर्जा भर सकती है। 


पर्वत के अंदर प्रवेष करते ही आंखों के सामने अलग अलग नजारे आने लगते हैं। पहले आप केवल झूमते वृक्षों को ही देखते थे पर अब सरसराती हवा को अपने कानों से महसूस भी करने लगते हैं। कुछ दूर आगे बढ़ने के बाद हवा के साथ-साथ बहती जलधारा की भी आवाज आने लगती है। जलधारा तक पहंचते ही आपको तरह-तरह के पक्षी कलरव करते भी दिख जायेंगे। कुछ ऐसे पक्षी भी मिलेंगे जो जंगली फूलों का रसपान करने के लिए फूलों पर मंडराते हुए दिख जायेंगे।  
 


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