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गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

इस तरह माता जगदंबा ने ढे़र कर दिया था असुरों की विशाल सेना

 

नवरात्र - 3
नवरात्र के असवर पर मैं देवी द्वारा किए गए असुर वध का वर्णन कर रहा हूं। पिछले अंक में आपने पढ़ा था कि कैसे मधु कैटभ नामक दो असूरों का वध हुआ था। वहीं आज के अंक महिसाषुर सेना वध के प्रसंग का वर्णन कर रहा हूं।
  एक समय देवताओं और असुरों के बीच भीषण संग्राम चल रहा था। एक ओर जहां देवताओं के नायक भगवान इंद्र थे वहीं दूसरी ओर महिषासुर असुरों का नेत्त्व कर रहा था। और इस युद्ध में महिषासुर ने देवतओं पर विजय पा लिया तथा खुद इंद्र बन बैठा। इधर हारे हुए देवता सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के पास पहुंचे तथा अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा - अब हम आपके ही शरण में हैं। उसके वध का कोई उपाय सोचिये।

देवताओं के वचन सुनकर भगवान बिष्णु व भगवान शिव ने दैत्यों पर बड़ा क्रोध किया। अत्यन्त क्रोध में भरे हुए श्री बिष्णु के मुख से एक महान तेज प्रकट हुआ। ठीक उसी तरह अन्य देवताओं से भी एक तेज निकला और सब मिलकर एक हो गया। महान तेज का वह पुंज जाज्वल्यमान पर्वत सा जान पड़ा। देवताओं ने देखा, उसकी ज्वालायें संपूर्ण दिशाओं में व्याप्त हो रही थी। अलग-अलग देवताओं के ज्वाला से अलग-अलग अंगों का प्रादुर्भाव होने लगा और अंततः एक देवी प्रकट हुई। प्रकट हुई देवी को देखकर महिषासुर के सताये हुए देवता बहुत प्रसन्न हुए। सभी देवताओं ने अपने अस्त्र-शस्त्र देवी को भेंट किया।

देवी ने जब उंचे स्वर में अट्टहासपूर्वक गर्जना की तो संपूर्ण विश्व में हलचल मच गयी। पृथ्वी डोलने लगी तथा पर्वत हिलने लगे। इससे देवताओं में प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी। सभी ने समवेत स्वर जयकारे लगाये। देवताओं ने कहा - ‘देवी! तुम्हारी जय हो।‘ साथ ही महषिर्यों ने भक्तिभाव से विनम्र होकर उनका स्तवन किया।

इधर देवी की गर्जना से दैत्य सहम उठे। चिक्षुर नामक एक शक्तिशाली असुर था जो महिषासुर का सेनानायक था। वह देवी के साथ युद्ध करने लगा। अन्य दैत्यों की चतुरांगिणी सेना साथ लेकर चामर भी लड़ने लगा। साठ हजार रथियों को साथ लेकर महाहनु नामक दैत्य युद्घ करने लगा। धीरे -धीरे भारी संख्या में अन्य दैत्य भी आकर देवी से लड़ने लगे। इधर देवी ने भी क्रोध में आकर खेल-खेल में ही अपने अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करके दैत्यों के समस्त अस़्त्र-शस्त्र काट डाले। उनके मुख पर परिश्रम या थकावट का रंचमात्र भी चिह्न नहीं था। इस तरह घोर संग्राम हुआ और जगदंबा ने असुरों की विशाल सेना को क्षणभर में नष्टकर दिया। ठीक उसी तरह जिस तरह तृण और काठ के भारी ढ़ेर को आग कुछ ही क्षणों में भस्म कर देती है। महिषासुर की सेना का संहार होेते देख आकाश में खड़े देवताओं ने पुष्पवर्षा की।

कल के अंक में पढ़ें महिषासुर का वध
                                                                                                                          दीपक मिश्रा, देशदुनियावेब  

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