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मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

भये प्रगट कृपाला दीनदयाला ...

भगवान राम, लक्ष्मण व जानकी की प्रतिमा
 21 अप्रैल 2021 को मनेगी रामनवमी

 21 अप्रैल 2021 को चैत्र शुक्लपक्ष की नवमी तिथि है और इस दिन मर्यादा पुरूषोत्त्म भगवान राम का जनमोत्सव मनाया जायेगा। रामनवमी को लेकर माहौल भक्तिमय होने लगा है। हलांकि इस बार संक्रमण की बढ़ती रफ्तार के कारण रामनवमी की पूजा-अर्चना सादगी से ही होगी। हलांकि जिस समय पोस्ट लिखा जा रहा है उस समय झारखंड सरकार संपूर्ण लाॅकडाउन लगाू करने की तैयारी कर रही है। ऐसे में कही लाॅकडाउन लग जाता है और मंदिर प्रवेश में पाबंदी लग जाती है तो तस्वीर बिल्कुल अलग होगी। लोग घर में पूजा करेंगे। कई अन्य राज्यों में मंदिर प्रवेश में पाबंदियां है।

इस दिन हनुमान जी की भी होती है पूजा

मालूम हो कि रामनवमी के अवसर पर भगवान राम की पूजा के साथ-साथ भगवान हनुमान की भी पूजा की जाती है। मंदिर व घरों में भगवान हनुमान का ध्वजा लगाया जाता है। झारखंड के विभिन्न बाजारों में महावीरी झंडे को बिकते देखा जा सकता है। महावीरी पताका 20 रुपये से लेकर 200 रुपये तक में बिक रहा है। वहीं बांस की कीमत एक सौ रुपया से लेकर डेढ़ सौ रुपये में मिल रहा है।जहां जैसी उपलब्धता है वहां उसी कीमत पर मिल रहा है। इसके अलावे पूजन सामग्री में अगरबत्ती, लड्डू, सिंदूर, फल आदि की भी खरीदारी की जा रही है।

जानें, रामनवमी का महत्व

 रामनवमी के साथ ही जुड़ा है मां दुर्गा के नवरात्रों का समापन। कहा जाता है कि भगवान श्रीराम ने धर्मयुद्ध में विजय पाने के लिए देवी दुर्गा की पूजा की। देवी दुर्गा से उन्हें असीम शक्ति प्राप्त हुई। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार राम नवमी के स्वयं भगवान विष्णु ने भगवान राम के रुप में अवतार लिया था। यही वजह है कि पूरे देश भर में रामनवमी बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

रामनवमी के साथ ही नवरात्रि का समापन हो जाता है। पौराणिक ग्रथों के अनुसार रामनवमी के दिन ही भगवना बिष्णु ने स्वयं राम के रूप में अवतार लिया था। श्रीरामचरितमानस में तुलसीदास जी लिखते हैं -
              

                  नौमी  तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता।।
                   मध्य  दिवस  अति  सीत  न   घाम। पावन काल लोक विश्रामा ।।

 

अर्थात, चैत्र का महीना था। और इस महीने के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि थी। मुहूर्त की बात करें तो उस समय अभिजीत था जो कि भगवान हरि को प्रिय है। मध्यदिवस यानी बारह बजे के लगभग का समय था और उस समय न तो ज्यादा गरमी थी और न ज्याद ठंढ़। वह पवित्र समय सबको शांति देने वाला था।  

 जन्म से पूर्व भगवान बिष्णु ने माता कौसल्या को अपना वास्तविक रूप दिखाया तथा उन्हें पूर्वजन्म की कई बातें बतायी। उसके बाद कौसल्या प्रभु से विनती करती हैं कि वह अपना यह रूप त्याग दें तथा शिशु रूप धारण करें। क्योंकि भगवान द्वारा किया गया बाललीला परम अनुपम होगा। विनती सुनते ही भगवान बिष्णु ने शिशु का रूप लेकर रोना शुरू कर दिया। इस तरह भगवान राम का अवतार होता है। गोस्वमी तुलसीदास जी के शब्दों में  -
     

                                          माता  पुनि  बोली  सो मति डोली तजहु तात यह रूपा।
                                          कीजै सीसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा।
                                          सुनि  बचन  सुजाना  रोदन  ठाना होइ बालक सुरभूपा।
                                         यह चरित जो गावहीं हरिपद पावहीं ते न परहिं भवकूपा।


                                                                                                               

                                                                                                                    दीपक मिश्रा, देशदुनियावेब


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