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शनिवार, 24 अप्रैल 2021

इस तरह के 14 व्यक्ति को न मानें जीवित

 

केवल संास लेने भर को ही जीवित नहीं कह सकते हैं। खुद का पेट तो जानवर भी भर लेता है पर कुछ वैसे ही तरीके एक इंसान भी अपना जीवन व्यतीत करें तो फिर वह मनुष्य कैसा। रामचरितमानस में तो कहा गया है कि 14 प्रकार के व्यक्ति जीवित होते हुए भी मृत हैं। लंकाकांड के रावण-अंगद संवाद प्रसंग में यह यह वर्णन आता है कि भगवान राम की ओर शांतिदूत बनकर आये बालि पुत्र अंगद रावण को श्रीराम से बैर त्यागने के बहुत समझाते हैं पर रावण अपने ही हठ में अड़ा रहता है और कटु वचन बोलता है। 

जवाब देते हुए अंगद कहते हैं कि तू राक्षसों का राजा है और बड़ा अभिमानी है। लेकिन मैं प्रभु श्रीराम के सेवक का भी सेवक हूं। यदि भगवान के अपमान से डरूं तो देखते-देखते मैं तेरा संहार कर सकता हूं। लेकिन मरे हुए को मारने में कुछ भी पुरूषत्व नहीं है। उन्होंने बताया कि चैदह प्राणी जीते हुए भी मुरदे के समान हैं।

                        कौल कामबस कृपिन बिमूढ़ा  ।  अति  दरिद्र  अजसि  अत  बूढ़ा।।

                       तनु  पोषक  निंदक  अघ  खानी।  जीवत  सव  सम  चौदह  प्रानी।।


कौल - कौल अर्थात वाममार्गी। जो व्यक्ति पूरी दुनिया से उल्टा चले । जो संसार की हर बात के पीछे नकारात्मकता खोजता हो । नियमोंए परंपराओं और लोक व्यवहार के खिलाफ चलता हो। वह वाम मार्गी कहलाता है । ऐसे काम करने वाले लोग मृत समान माने गए हैं ।

कामी - जो व्यक्ति अत्यंत भोगी होए कामवासना में लिप्त रहता होए जो संसार के भोगों में उलझा हुआ होए वह मृत समान है । जिसके मन की इच्छाएं कभी खत्म नहीं होती और जो प्राणी सिर्फ अपनी इच्छाओं के अधीन होकर ही जीता हैए वह मृत समान है । वह अध्यात्म का सेवन नही करता है । सदैव वासना में लीन रहता है ।

कंजूस - अति कंजूस व्यक्ति भी मरा हुआ होता है । जो व्यक्ति धर्म के कार्य करने में आर्थिक रूप से किसी कल्याण कार्य में हिस्सा लेने में हिचकता हो । दान करने से बचता हो । ऐसा आदमी भी मृत समान ही है ।

महामूर्ख - अत्यन्त मूढ़ यानी मूर्ख व्यक्ति भी मरा हुआ होता है । जिसके पास विवेक, बुद्धि नहीं हो । जो खुद निर्णय ना ले सके यानि हर काम को समझने या निर्णय को लेने में किसी अन्य पर आश्रित हो ऐसा व्यक्ति भी जीवित होते हुए मृत के समान ही है । मूढ़ अध्यात्म को समझता नहीं है ।

अति दरिद्र. - गरीबी सबसे बड़ा श्राप है । जो व्यक्ति धन, आत्म.विश्वास, सम्मान और साहस से हीन हो, वो भी मृत ही है । अत्यन्त दरिद्र भी मरा हुआ है । दरिद्र व्यक्ति को दुत्कारना नहीं चाहिए, क्योंकि वह पहले ही मरा हुआ होता है । गरीब लोगों की मदद करनी चाहिए ।

अजसि.- जिस व्यक्ति को संसार में बदनामी मिली हुई हैए वह भी मरा हुआ है । जो घर, परिवार, कुटुंब, समाज, नगर या राष्ट्र किसी भी ईकाई में सम्मान नहीं पाता है। वह व्यक्ति मृत समान ही होता है ।

अति बूढ़ा - अत्यन्त वृद्ध व्यक्ति भी मृत समान होता हैए क्योंकि वह अन्य लोगों पर आश्रित हो जाता है । शरीर और बुद्धि, दोनों असक्षम हो जाते हैं । ऐसे में कई बार स्वयं वह और उसके परिजन ही उसकी मृत्यु की कामना करने लगते हैं, ताकि उसे इन कष्टों से मुक्ति मिल सके ।

सदा रोगवश - जो व्यक्ति निरंतर रोगी रहता हैए वह भी मरा हुआ है । स्वस्थ शरीर के अभाव में मन विचलित रहता है । नकारात्मकता हावी हो जाती है । व्यक्ति मृत्यु की कामना में लग जाता है । जीवित होते हुए भी रोगी व्यक्ति जीवन के आनंद से वंचित रह जाता है ।

बिष्णु विमुख - जो व्यक्ति परमात्मा का विरोधी हैए वह भी मृत समान है । जो व्यक्ति ये सोच लेता है कि कोई परमतत्व है ही नहीं । हम जो करते हैंए वही होता है । संसार हम ही चला रहे हैं । जो परमशक्ति में आस्था नहीं रखता हैए ऐसा व्यक्ति भी मृत माना जाता है ।


श्रुति, संत विरोधी - जो संत, ग्रंथ, पुराण का विरोधी है। वह भी मृत समान होता है । श्रुत और सन्त मार्गदर्शक की भूमिका निभाते है । अगर गाड़ी में ब्रेक ना हो तो वह कहीं भी गिरकर एक्सीडेंट हो सकता है । वैसे ही समाज को सन्त के जैसे मार्गदर्शक की जरूरत है ।

तनु पोषक.- ऐसा व्यक्ति जो पूरी तरह से आत्म संतुष्टि और खुद के स्वार्थों के लिए ही जीता है। संसार के किसी अन्य प्राणी के लिए उसके मन में कोई संवेदना ना हो, तो ऐसा व्यक्ति भी मृतक समान ही है । जो लोग खाने.पीने में, वाहनों में स्थान के लिए, हर बात में सिर्फ यही सोचते हैं कि सारी चीजें पहले हमें ही मिल जाएं बाकि किसी अन्य को मिले ना मिले, वे मृत समान होते हैं । ऐसे लोग समाज और राष्ट्र के लिए अनुपयोगी होते हैं । शरीर को अपना मानकर उसमें रत रहना मूर्खता है । क्योंकि यह शरीर विनाशी है । नष्ट होने वाला है ।

निंदक - अकारण निंदा करने वाला व्यक्ति भी मरा हुआ होता है । जिसे दूसरों में सिर्फ कमियां ही नज़र आती हैं । जो व्यक्ति किसी के अच्छे काम की भी आलोचना करने से नहीं चूकता है । ऐसा व्यक्ति जो किसी के पास भी बैठे, तो सिर्फ किसी ना किसी की बुराई ही करे। वह इंसान मृत समान होता है ।

अघ खानी - वैसे व्यक्ति जो महान पाप का खान है अर्थात माहन पापी है वह भी मृत के समान ही है। पापी से दूर ही रहना चाहिए। जो हमेशा पाप कर्माें में रत रहता है उसके द्वारा कभी भी किसी का भला नहीं हो सकता।

ऐसा कहते हुए अंगद कहते हैं -
       
            अस बिचारी खल बधउं न तोही । अब जनि रिस उपजावसि मोही    

अर्थात, दुष्ट रावण! उेसा विचार कर ही मैं तुझे नहीं मारता पर तू अपने वचनो में मुझे क्रोध न दिला।



                                                                                                                          दीपक मिश्रा, देशदुनियावेब  
 
    

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