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मंगलवार, 7 दिसंबर 2021

आठ दिसंबर 2021 को मनेगी विवाह पंचमी

 DDW, DESK : आठ दिसंबर 2021 यानी बुधवार को विवाह पंचमी मनायी जायेगी। पूरे देश में विवाह पंचमी का उत्सव हर्षोल्लास मनाया जाता है, ऐसा इसलिए क्योंकि इसी दिन भगवान श्री राम व माता सीता का विवाह हुआ था। सीता जी का विवाह स्वयंवर की परंपरा के अनुसार हुआ था। सीता जी ने भगवान राम का वरण मार्गषीर्श माह की षुक्ल पंचमी को हुआ था।

विभिन्न मंदिरों में पूजनोत्सव की तैयारी अंतिम चरण में

इस अवसर पर देश के विभिन्न राम मंदिरों में पूजनोत्सव का आयोजन किया जायेगा जिसकी तैयारी अंतिम चरण पर है। साथ ही मुख्य मंदिरों में भारी भीड उमड़ने की उम्मीद है। इधर भगवान रामचंद्र का जन्मस्थल अयोध्या भी विवाहोत्सव में लीन है। जानकीमहल में गत सप्ताह से ही प्रवाहित उत्सव की श्रृंखला सोमवार को फुलवारी प्रसंग से होकर गुजरी। त्रेता के विवरण के अनुसार सीता से परिणय सूत्र में बंधने से पूर्व श्रीराम जनकपुर पहुंचते हैं और राजा जनक की पुष्प वाटिका में उनका सीता से प्रथम मिलन होता है। सोमवार को जानकी महल में यही पुष्प वाटिका फुलवारी प्रसंग के रूप में पूरी संजीदगी से संयोजित थी। मंदिर की मनोहारी वाटिका में सीता.राम के स्वरूपों का मिलन वास्तविकता का आभास दिला रहा था।
 

जेहिं मंडप दुलहिनि बैदेही। सो बरनै असि मति कबि केही

पूरे रामायण में रामविवाह का प्रसंग सर्वाधिक आनंददायक है। गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमानस में ़ऋषि विश्वामित्र दोनो भाई राम व लक्ष्मण को जनकपुर नगर का भ्रमण कराते हैं। नगरवासी दोनों भाइयों को देखते हैं तो उन्हें ऐसा लगता है मानों विधाता ने ही इन्हें वर रूप में वरण हेतु भेजा है।  मर्यादा पुरूषोत्तम राम जब भाई लक्ष्मण के साथ अपने भाई साथ पुष्पवाटिका पहुचंते हैं तभी कुलदेवी पूजन हेतु सीता जी सखियों सहित पहुंचती हैं। वे दोनों एक दूसरे को देखते हैं। तुलसीदास ने सीता जी के मनोभाव को कुछ इस प्रकार दर्शाया है :

             जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी।

             कही न सकही कछु मन सकुचानी।।

विभिन्न राजा महाराजाओं के अलावा स्वयंवर में किन्नर, यक्ष, गंधर्व, नाग सहित तीनों लोकों के महिपाल उपस्थित थे। शिवधनुष तोड़ने को लेकर दिग्गजों में होड़ है पर तोड़ने की बात तो दूर कोई हिला भी नहीं पाते हैं। और यह सब देखकर राजा जनक के मन में घोर निराशा छा जाती है।  विश्वामित्र राजा जनक की निराशा दूर करते हुए भगवान राम को शिव धनुष तोड़ने का आदेश देते हैं।

             उठहु राम भंजहु भवचापा।

             मेटहु तात जनक परितापा।।

आदेश पाते ही श्री राम सहज भाव से शिवधनुष उठाते हैं और चाप चढ़ाने के क्रम में धनुष टूट जाता है। वाद्य यंत्र बनजे लगते हैं व मंगल गीत शुरू हो जाता है। सीता के आनंद का कोई ओर छोर नहीं रहता है। रामचरितमानस में विवाह मंडप के दृश्य को कुछ इस तरह प्रस्तुत किया गया है :

        दीप मनोहर मनिमय नाना। जाइ न बरनि बिचित्र बिताना।।

        जेहिं मंडप दुलहिनि बैदेही। सो बरनै असि मति कबि केही।।

        दूलहु राम रूप गुन सागर। सो बितानु तिहुं लोक उजागर।।

        जनक भवन कै सोभा जैसी। गृह गृह प्रति पुर देखिअ तैसी।।


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